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ⓘ अकाल भोजन का एक व्यापक अभाव है जो किसी भी पशुवर्गीय प्रजाति पर लागू हो सकता है। इस घटना के साथ या इसके बाद आम तौपर क्षेत्रीय कुपोषण, भुखमरी, महामारी और मृत्यु द ..

अकाल
                                     

ⓘ अकाल

अकाल भोजन का एक व्यापक अभाव है जो किसी भी पशुवर्गीय प्रजाति पर लागू हो सकता है। इस घटना के साथ या इसके बाद आम तौपर क्षेत्रीय कुपोषण, भुखमरी, महामारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो जाती है। जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक वर्षा कम होती है या नहीं होती है तो इसे सूखा या अकाल कहा जाता है। सूखे के कारण प्रभावित क्षेत्र की कृषि एवं वहाँ के पर्यावरण पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है। इतिहास में कुछ अकाल बहुत ही कुख्यात रहे हैं जिसमें करोंड़ों लोगों की जाने गयीं हैं।

अकाल राहत के आपातकालीन उपायों में मुख्य रूप से क्षतिपूरक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन और खनिज पदार्थ देना शामिल है जिन्हें फोर्टीफाइड शैसे पाउडरों के माध्यम से या सीधे तौपर पूरकों के जरिये दिया जाता है। सहायता समूहों ने दाता देशों से खाद्य पदार्थ खरीदने की बजाय स्थानीय किसानों को भुगतान के लिए नगद राशि देना या भूखों को नगद वाउचर देने पर आधारित अकाल राहत मॉडल का प्रयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि दाता देश स्थानीय खाद्य पदार्थ बाजारों को नुकसान पहुंचाते हैं।

लंबी अवधि के उपायों में शामिल हैं आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे कि उर्वरक और सिंचाई में निवेश, जिसने विकसित दुनिया में भुखमरी को काफी हद तक मिटा दिया है। विश्व बैंक की बाध्यताएं किसानों के लिए सरकारी अनुदानों को सीमित करते हैं और उर्वरकों के अधिक से अधिक उपयोग के अनापेक्षित परिणामों: जल आपूर्तियों और आवास पर प्रतिकूल प्रभावों के कारण कुछ पर्यावरण समूहों द्वारा इसका विरोध किया जाता है।

                                     

1. अकाल के कारण

अकाल की परिभाषाएं तीन अलग-अलग श्रेणियों पर आधारित हैं - खाद्य आपूर्ति के आधार पर, भोजन की खपत के आधापर और मृत्यु दर के आधार पर. अकाल की कुछ परिभाषाएं हैं:

  • ब्लिक्स - खाद्य पदार्थों की व्यापक कमी जिसके कारण क्षेत्रीय मृत्यु दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।
  • रैवेलियन - किसी आबादी के कुछ खंडों में भोजन ग्रहण करने पर असामान्य रूप से गंभीर खतरे के साथ असामान्य रूप से उच्च मृत्यु दर.
  • ब्राउन और एखोलम - खाद्य आपूर्ति में अचानक, तीव्रता से होने वाली कमी जिसके परिणाम स्वरूप व्यापक भुखमरी पैदा हो जाती है।
  • स्क्रिमशॉ - बड़ी संख्या में लोगों की भोजन की खपत के स्तर में अचानक गिरावट.
  • क्यूनी - परिस्थितियों का एक ऐसा सेट जो उस समय उत्पन्न होता है जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त नहीं कर पाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप एक बड़े पैमाने पर तीव्रता से कुपोषण फ़ैल जाता है।

किसी आबादी में खाद्य पदार्थों की कमी या तो भोजन की कमी या फिर भोजन के वितरण में कठिनाइयों के कारण होता है; यह स्थिति प्राकृतिक जलवायु के उतार-चढ़ावों और दमनकारी सरकार या युद्ध से संबंधित चरम राजनीतिक परिस्थितियों के कारण और भी बदतर हो सकती है। आयरलैंड का भीषण अकाल आनुपातिक रूप से सबसे बड़े ऐतिहासिक अकालों में से एक था। इसकी शुरुआत 1845 में आलू की बीमारी की वजह से हुई थी और यह इसलिए भी हुआ क्योंकि खाद्य पदार्थों को आयरलैंड से इंग्लैंड भेजा जा रहा था। केवल अंग्रेज ही उच्च मूल्यों का भुगतान करने में सक्षम थे। हाल ही में इतिहासकारों ने अपने उन आकलनों को संशोधित किया है जिसके अनुसार यह बताया गया था कि अकाल को कम करने में अंग्रेजों द्वारा कितना अधिक नियंत्रण का प्रयास किया जा सकता था, इसमें यह पाया गया कि आम तौपर जितना समझा जाता था उन्होंने उससे कहीं अधिक मदद करने की कोशिश की थी। अकाल के कारण के लिए 1981 तक परंपरागत व्याख्या खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी एफएडी की परिकल्पना के रूप में थी। धारणा यह थी कि सभी अकालों की केंद्रीय वजह खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी थी। हालांकि एफएडी यह नहीं समझा पाया कि क्यों आबादी का केवल एक ख़ास खंड जैसे कि खेतिहर मजदूर अकाल से प्रभावित थे जबकि अन्य अकाल से अछूते थे। हाल ही के कुछ अकालों के अध्ययन के आधापर एफएडी की निर्णायक भूमिका पर सवाल उठाया गया है और यह सुझाव दिया गया है कि जल्द से जल्द भुखमरी की स्थिति लाने का कारण बनने वाली प्रणालियों में सिर्फ खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी के अलावा भी कई अन्य कारक शामिल हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अकाल अधिकारों का एक परिणाम है, इस प्रस्तावित सिद्धांत को "आदान-प्रदान के अधिकारों की विफलता" या एफईई कहा जाता है। किसी व्यक्ति के पास विभिन्न प्रकार की वस्तुएं हो सकती हैं जिनकी अदला-बदली एक बाजार व्यवस्था में उसकी जरूरत की अन्य चीजों के बदलें में की जा सकती है। आदान-प्रदान व्यापार या उत्पादन या दोनों के संयोजन के माध्यम से किया जा सकता है। इन अधिकारों को व्यापार-आधारित या उत्पादन-आधारित अधिकार कहा जाता है। इस प्रस्तावित दृष्टिकोण के अनुसार अकाल की स्थिति व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों के आदान-प्रदान की क्षमता ख़त्म हो जाने के कारण आती है। एफईई के कारण होने वाले अकालों का एक उदाहरण किसी खेतिहर मजदूर द्वारा अपने प्रमुख अधिकारों का आदान-प्रदान करने की अक्षमता है, जैसे कि चावल का मजदूर जब उसके रोजगार की स्थिति डावांडोल या पूरी तरह से समाप्त हो जाती है।

कुछ तत्व एक विशेष क्षेत्र को अकाल के लिए अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • एक दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था
  • अनुपयुक्त सामाजिक ढांचा
  • अनुपयुक्त भौतिक अवसंरचना
  • एक कमजोर या पहले से तैयार नहीं रहने वाली सरकार
  • गरीबी

कुछ मामलों में, जैसे कि चीन में ग्रेट लीप फॉरवार्ड जिसने पूर्ण संख्याओं में सबसे बड़ा अकाल पैदा किया था, 1990 के दशक के मध्य में उत्तर कोरिया में या सन 2000 की शुरुआत में जिम्बाब्वे में, अकाल की स्थिति सरकारी नीतियों के एक अनपेक्षित परिणाम के रूप में उत्पन्न हो सकती है। मलावी ने विश्व बैंक की बाध्यताओं के खिलाफ किसानों को अनुदान देकर अपने अकाल का खात्मा किया। इथियोपिया में 1973 के वोल्लो अकाल के दौरान खाद्य पदार्थों को वोल्लो से बाहर राजधानी शहर अदीस अबाबा में भेजा जाता था जहां इनके लिए कहीं अधिक कीमतें मिल सकती थीं। 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1980 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया और सूडान की तानाशाहियों के निवासियों को भारी अकाल का सामना करना पड़ा, लेकिन जिम्बाब्वे और बोत्सवाना के लोकतंत्रों में राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन में गंभीर कमी के बावजूद भी उन्होंने अपना बचाव किया। सोमालिया में अकाल एक विफल प्रशासन की वजह से आया।

कई अकाल बड़ी आबादी वाले देशों की तुलना में, जिनकी आबादी क्षेत्रीय वहन क्षमता से अधिक हो जाती है, खाद्य उत्पादन में असंतुलन के कारण पैदा होते हैं। ऐतिहासिक रूप से अकाल की स्थिति कृषि संबंधी समस्याओं जैसे कि सूखा, फसल की विफलता या महामारी की वजह से आयी है। मौसम के बदलते मिजाज, संकट, युद्ध और महामारी जनित बीमारियों जैसे कि काली मौत से निबटने में मध्य युगीन सरकारों की अप्रभावशीलता मध्य युगों के दौरान यूरोप में सैकड़ों अकालों को जन्म देने में सहायक सिद्ध हुई जिनमें ब्रिटेन में 95 और फ्रांस में 75 अकाल शामिल हैं। फ्रांस में सौ सालों के युद्ध, फसल की विफलताओं और महामारियों ने इसकी आबादी दो-तिहाई तक कम कर दी थी।

फसल कटाई की विफलता या परिस्थितियों में बदलाव जैसे कि सूखा एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसके द्वारा एक बड़ी संख्या में लोग निरंतर वहां रह सखते हैं जहां जमीन की वहन क्षमता में मूलतः अस्थायी रूप से कमी आ गयी है। अकाल को अक्सर निर्वाह के लायक कृषि के साथ जोड़ा जाता है। एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र में कृषि का कुल अभाव अकाल का कारण नहीं बनता है; एरिज़ोना और अन्य समृद्ध क्षेत्र अपने खाद्य पदार्थ के बहुत अधिक हिस्से का आयात करते हैं, क्योंकि इस तरह के क्षेत्र व्यापार के लिए पर्याप्त आर्थिक सामग्रियों का उत्पादन करते हैं।

अकाल की स्थिति ज्वालामुखीय घटना के कारण भी उत्पन्न हुई है। 1885 में इंडोनेशिया में माउंट तंबोरा ज्वालामुखी में विस्फोट के कारण दुनिया भर में फसल नष्ट हो गए थे और अकाल की स्थितियां पैदा हो गयी थीं जिसके कारण 19वीं सदी का भीषण अकाल पड़ा था। वैज्ञानिक समुदाय की मौजूदा सर्वसम्मति यह है कि ऊपरी वायुमंडल में निकलने वाले एयरोसोल और धूलकण सूर्य की ऊर्जा को जमीन तक पहुंचने से रोककर तापमान को ठंडा कर देते हैं। यही प्रणाली सैद्धांतिक रूप से अत्यंत विशाल उल्का-पिंडों के कारण बड़े पैमाने पर विलुप्तियों की हद तक पड़ने वाले प्रभावों पर लागू होती है।

                                     

1.1. अकाल के कारण भविष्य में अकाल के खतरे

इन्हें भी देखें: Water crisis गार्जियन की रिपोर्ट है कि 2007 में दुनिया की लगभग 40% कृषि योग्य भूमि का स्तर गंभीर रूप से गिर गया है। यूएनयू के घाना-स्थित इंस्टिट्यूट फॉर नेचुरल रिसोर्सेस इन अफ्रीका के अनुसार, अगर अफ्रीका में मिट्टी के स्तर में गिरावट के मौजूदा रुझान जारी रहे तो यह महाद्वीप 2025 तक अपनी आबादी के सिर्फ 25% हिस्से को भोजन प्रदान करने में सक्षम होगा। 2007 के उत्तरार्द्ध तक जैव ईंधन में इस्तेमाल के लिए होने वाली खेती में वृद्धि के साथ-साथ दुनिया में तेल की कीमतों के तकरीबन 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच जाने के कारण मुर्गियों और डेयरी के गायों तथा अन्य पशुओं को खिलाने वाले खाद्यान्नों की कीमतें काफी बढ़ गयी थीं, इसी वजह से गेहूं 58% अधिक, सोयाबीन 32% अधिक और मक्के 11% अधिक की कीमतों में वर्ष भर में काफी बढ़त देखी गयी। सन 2007 में दुनिया भर के कई देशों में खाद्य दंगे होते देखे गए। स्टेम रस्ट की एक महामारी जो गेहूं के लिए विनाशकारी होती है और Ug99 प्रजाति के कारण पैदा होती है, 2007 में यह संपूर्ण अफ्रीका और एशिया में फ़ैल गयी थी।

20वीं सदी की शुरुआत में आंशिक रूप से अकाल से निपटने के क्रम में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन उर्वरकों, नए कीटनाशकों, रेगिस्तानी कृषि और अन्य कृषि प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल होना शुरु हो गया था। 1950 और 1984 के बीच जब हरित क्रांति ने कृषि को प्रभावित किया, विश्व खाद्यान्न उत्पादन में 250% की वृद्धि हुई। इस बढ़त का ज्यादातर हिस्सा गैर-टिकाऊ है। इन कृषि प्रौद्योगिकियों ने फसल की पैदावार को अस्थायी रूप से बढ़ा दिया था, लेकिन कम से कम 1995 तक इस बात के संकेत मिल गए थे कि ये कृषि योग्य भूमि की कमी का कारण बन सकते थे जैसे कि कीटनाशकों की दृढ़ता जो मिट्टी का संदूषण बढ़ाती है और खेती के लिए उपलब्ध क्षेत्र को कम कर देती है. विकसित देशों ने अकाल की समस्या वाले विकासशील देशों के साथ इन प्रौद्योगिकियों की साझेदारी की है, लेकिन अपेक्षाकृत कम विकसित देशों में इन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिए नैतिक सीमाएं मौजूद हैं। इसके लिए अक्सर अकार्बनिक उर्वरकों और स्थिरता की कमी वाले कीटनाशकों के एक संयोजन को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी और कृषि के प्रोफ़ेसर, डेविड पिमेंटेल और नेशनल रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑन फ़ूड एंड न्यूट्रीशन आईएनआरएएन में वरिष्ठ शोधकर्ता, मारियो गियामपिएत्रो अपने अध्ययन फ़ूड, लैंड, पॉपुलेशन एंड द यूएस इकोनोमी में एक चिरस्थायी अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका की अधिकतम जनसंख्या 200 मिलियन पर रखते हैं। अध्ययन कहता है कि एक चिरस्थायी अर्थव्यवस्था को प्राप्त करने और आपदा से बचने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी आबादी कम से कम एक-तिहाई कम करनी होगी और दुनिया की आबादी को दो-तिहाई तक कम करना होगा। इस अध्ययन के लेखकों का मानना ​​है कि उल्लिखित कृषि संकट केवल 2020 के बाद हमें प्रभावित करना शुरू कर देगा और 2050 तक यह संकटपूर्ण नहीं होगा। आगामी वैश्विक तेल उत्पादन के चोटी पर पहुंचने और इसके बाद उत्पादन में गिरावट के साथ-साथ उत्तर अमेरिकी प्राकृतिक गैस उत्पादन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने से इस कृषि संकट को अपेक्षा से कहीं अधिक जल्दी ला देने की संभावना काफी बढ़ जाएगी.

भूविज्ञानी डेल एलन फीफर का दावा है कि आने वाले दशकों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में किसी राहत के बिना उत्तरोत्तर वृद्धि और वैश्विक स्तर पर ऐसी भारी भुखमरी देखी जा सकती है जिसका अनुभव पहले कभी नहीं किया गया है। पानी की कमी की समस्या जो अनेक छोटे देशों में खाद्यान्नों के भारी आयात को पहले से बढ़ावा दे रही है, यह जल्दी ही बड़े देशों जैसे कि चीन या भारत में भी यही स्थिति ला सकती है। शक्तिशाली डीजल और बिजली के पम्पों के व्यापक अति-उपयोग के कारण अनेक देशों उत्तरी चीन, अमेरिका और भारत सहित में जल स्तर घटता जा रहा है। पाकिस्तान, ईरान और मेक्सिको अन्य प्रभावित देशों में शामिल हैं। यह अंततः पानी की कमी और अनाज फसल में कटौती करने का कारण बनेगा. यहाँ तक कि अपने जलवाही स्तरों की अत्यधिक पम्पिंग के साथ चीन ने एक अनाज घाटा विकसित किया है जो अनाज की कीमतों पर दबाव बढाने में योगदान करता है। इस सदी के मध्य तक दुनिया भर में पैदा होने वाले तीन बिलियन लोगों में से अधिकांश के ऐसे देशों में जन्म लेने की संभावना है जो पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रही है।

चीन और भारत के बाद पानी की भारी कमी से जूझते दूसरी श्रेणी के अपेक्षाकृत छोटे देशों में शामिल हैं -- अल्जीरिया, मिस्र, इरान, मेक्सिको और पकिस्तान. इनमे से चार देश अपने लिए अनाज के एक बड़े हिस्से का आयात पहले से ही किया करते हैं। सिर्फ पाकिस्तान आंशिक रूप से आत्मनिर्भर बना हुआ है। लेकिन हर साल 4 मिलियन की बढ़ती आबादी के कारण इसे भी जल्द ही अनाज के लिए विश्व बाज़ार का रुख करना पड़ेगा. संयुक्त राष्ट्र की जलवायु रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के हिमनद जो एशिया की सबसे बड़ी नदियों - गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्जे, मेकांग, सलवीन और येलो के लिए शुष्क-मौसम के प्रमुख जल स्रोत हैं, ये तापमान में वृद्धि और मानवीय मांग बढ़ने के कारण 2035 तक गायब हो सकते हैं। बाद में यह पता चला कि संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु रिपोर्ट में इस्तेमाल किये गये स्रोत में दरअसल 2035 नहीं बल्कि 2350 कहा गया है। हिमालयी नदियों के जलनिकास मार्ग के आसपास की भूमि में लगभग 2.4 बिलियन लोग रहते हैं। भारत, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार को आने वाले दशकों में गंभीर सूखे के बाद बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है। सिर्फ भारत में ही गंगा नदी 500 मिलियन से अधिक लोगों को पेयजल और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराती है।

                                     

2. अकाल के लक्षण

अकाल उप-सहाराई अफ्रीकी देशों को सबसे अधिक बुरी तरह से प्रभावित करता है लेकिन खाद्य संसाधनों की अत्यधिक खपत, भूजल की अत्यधिक निकासी, युद्ध, आंतरिक संघर्ष और आर्थिक विफलता के साथ अकाल दुनिया भर के लिए एक समस्या बनी हुई है जिसका सामना सैकड़ों लाख लोगों को करना पड़ता है। इस तरह के अकाल बड़े पैमाने पर कुपोषण और दरिद्रता का कारण बनते हैं; 1980 के दशक में इथियोपिया के अकाल में मरने वालों की संख्या अत्यधिक थी, हालांकि 20वीं सदी के एशियाई अकालों में भी व्यापक स्तर पर लोगों की मौतें हुई थीं। आधुनिक अफ्रीकी अकालों की पहचान व्यापक स्तर के अभाव और कुपोषण के साथ विशेष कर छोटे बच्चों की मृत्यु दर में वृद्धि से होती है।

प्रतिरक्षण सहित राहत की प्रौद्योगिकियों ने जन स्वास्थ्य अवसंरचना, सामान्य खाद्य राशन और कमजोर बच्चों के लिए पूरक भोजन की व्यवस्था में सुधार किया है, इससे अकालों के मृत्यु दर संबंधी प्रभावों में अस्थायी रूप से कमी आयी है, जबकि उनके आर्थिक परिणामों को अपरिवर्तित छोड़ दिया गया है और खाद्य उत्पादन क्षमता के सापेक्ष एक क्षेत्रीय जनसंख्या के एक बहुत बड़े अंतर्निहित मुद्दे को हल नहीं किया गया है। मानवीय संकट भी नरसंहार अभियानों, गृह युद्धों, शरणार्थियों के प्रवाह और चरम हिंसा तथा साम्राज्य के पतन के प्रकरणों से उत्पन्न होते हैं जिससे प्रभावित आबादी के बीच अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है।

भुखमरी और अकाल का खात्मा करने के लिए दुनिया के नेताओं द्वारा बार-बार दोहरागए कथित इरादों के बावजूद अकाल अफ्रीका और एशिया के ज्यादातर भागों में एक चिरकालिक खतरा बना हुआ है। जुलाई 2005 में फैमिन अर्ली वार्निंग सिस्टम्स नेटवर्क ने नाइजीरिया के साथ-साथ चाड, इथियोपिया, दक्षिण सूडान, सोमालिया और जिम्बाब्वे को आपात स्थिति का लेबल दिया था। जनवरी 2006 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने चेतावनी दी कि गंभीर सूखे और सैन्य संघर्ष के संयुक्त प्रभाव के कारण सोमालिया, केन्या, जिबूती और इथियोपिया में 11 मिलियन लोग भुखमरी के कगापर थे। 2006 में अफ्रीका में सबसे गंभीर मानवीय संकट सूडान के दारफुर क्षेत्र में था।

कुछ लोगों का मानना था कि हरित क्रांति 1970 और 1980 के दशक में अकाल का एक उपयुक्त जवाब था। हरित क्रांति की शुरुआत 20वीं सदी में अधिक-उपज वाले फसलों के संकर किस्मों के साथ हुई थी। 1950 और 1984 के बीच जब हरित क्रांति ने दुनिया भर में कृषि का नक्शा बदल दिया, विश्व अनाज उत्पादन में 250% की वृद्धि हुई। कुछ लोग इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहते हैं कि इन नए उच्च-उपज वाले फसलों के लिए अधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता होती है जो वातावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि अकाल से पीड़ित विकासशील देशों के लिए यह एक विकल्प था। ये अधिक-उपज वाले फसल तकनीकी रूप से अधिक लोगों को भोजन प्रदान करना संभव बनाते हैं। हालांकि इस बात के संकेत मिले हैं कि व्यापक स्तर की कृषि के साथ जुड़ी कुछ विशेष नीतिओं जैसे कि भूजल के अत्यधिक दोहन और कीटनाशकों तथा अन्य कृषि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण दुनिया के कई क्षेत्रों में क्षेत्रीय खाद्य उत्पादन चोटी पर पहुंच गया है।

फ्रांसिस मूर लैपे जो बाद में इंस्टिट्यूट फॉर फ़ूड एंड डेवलपमेंट पॉलिसी फ़ूड फर्स्ट के सह-संस्थापक बने, उन्होंने डाइट फॉर ए स्मॉल प्लानेट 1971 में यह तर्क दिया कि शाकाहारी आहार मांसाहारी आहारों की तुलना में उन्हीं संसाधनों के साथ एक बड़ी आबादी के लिए भोजन प्रदान कर सकते हैं।

ध्यान देने योग्य बात है कि आधुनिक अकालों की स्थिति को कभी-कभी गुमराह आर्थिक नीतियों, कुछ ख़ास आबादी को निर्धन बनाए या हाशिये में रखने के लिए बनागए राजनीतिक डिजाइन या युद्ध के कृत्यों द्वारा बिगाड़ दिया जाता है, राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने उन राजनीतिक परिस्थितियों की जांच की है जिसके तहत अकाल को रोका जा सकता है। अमर्त्य सेन कहते हैं कि भारत में मौजूद उदारवादी संस्थाओं के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी चुनाव और एक मुक्त प्रेस ने आजादी के बाद से देश में अकाल को रोकने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। एलेक्स डी वाल ने शासकों और जनता के बीच "राजनीतिक अनुबंध" पर ध्यान केंद्रित करने के लिए यह सिद्धांत विकसित किया है जो अकाल को रोकना सुनिश्चित करता है, जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि अफ्रीका में ऐसे राजनीतिक अनुबंधों की दुर्लभता और यह खतरा कि अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां राष्ट्रीय सरकारों से अकालों के लिए जवाबदेही की स्थिति को हटाकर उन अनुबंधों को कमजोकर देंगी।

                                     

2.1. अकाल के लक्षण अकाल के प्रभाव

अकाल के जनसांख्यिकीय प्रभाव तीक्ष्ण होते हैं। मृत्यु दर बच्चों और बुजुर्गों के बीच केंद्रित रहती है। एक सुसंगत जनसांख्यिकीय तथ्य यह है कि दर्ज किये गए सभी अकालों में पुरुष मृत्यु दर महिला से अधिक होती है, यहाँ तक कि उन आबादियों में भी जैसे कि उत्तरी भारत और पाकिस्तान जहां पुरुष को सामान्य रूप से लंबी उम्र का लाभ मिलता है। इसके कारणों में कुपोषण के दबाव में अधिक से अधिक महिला लचीलापन और संभवतः महिलाओं के शरीर में वसा की स्वाभाविक रूप से उच्च प्रतिशत को शामिल किया जा सकता है। अकाल के साथ-साथ प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती है। इसलिए अकाल किसी आबादी के प्रजनन के कोर - वयस्क महिलाओं - को आबादी की अन्य श्रेणियों की तुलना में कम प्रभावित करते हैं और अकाल के बाद की अवधियों की पहचान अक्सर बढ़ी हुई जन्म दर के साथ "पूर्वस्थिति" में आने के रूप में होती है। इसके बावजूद कि थॉमस माल्थस के सिद्धांत यह भविष्यवाणी करते हैं कि अकाल उपलब्ध खाद्य संसाधनों के अनुरूप आबादी के आकार को कम कर देते हैं, वास्तव में यहाँ तक कि सबसे गंभीर अकालों ने भी कुछ सालों से अधिक के लिए आबादी के विकास को शायद ही कभी कमजोर किया है। 1958-61 में चीन में, 1943 में बंगाल में और 1983-1985 में इथियोपिया में मृत्यु दर को एक बढ़ती हुई आबादी द्वारा सिर्फ कुछ ही वर्षों में पूर्वस्थिति में ला दिया था। अधिक से अधिक लंबी-अवधि का जनसांख्यिकीय प्रभाव है उत्प्रवास: 1840 के दशक के अकाल के बाद मुख्य रूप से आयरलैंड की आबादी उत्प्रवास की लहर के कारण काफी कम हो गयी थी।

                                     

2.2. अकाल के लक्षण खाद्य असुरक्षा के स्तर

आधुनिक समय में स्थानीय और राजनीतिक सरकार तथा गैर-सरकारी संगठन जो अकाल राहत प्रदान करते हैं उनके पास सीमित संसाधन मौजूद होते हैं जिनके जरिये उन्हें एक साथ उत्पन्न होने वाली खाद्य असुरक्षा की विभिन्न स्थितियों से निबटना पड़ता है। इस प्रकार खाद्य राहत सामग्री के सबसे प्रभावशाली ढंग से आवंटन के क्रम में खाद्य सुरक्षा के वर्गीकरण को श्रेणीबद्ध करने के विभिन्न विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें से एक सबसे प्रारंभिक विधि 1880 के दशक में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गयी भारतीय अकाल संहिता है। संहिताओं में खाद्य असुरक्षा के तीन चरणों को सूचीबद्ध किया गया था: लगभग-तंगी, अभाव और अकाल, इसके अलावा ये बाद में अकाल की चेतावनी या मापन प्रणालियों के निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली रहे थे। उत्तरी केन्या में तुर्काना लोगों के आवासीय क्षेत्रों की निगरानी के लिए विकसित पूर्व चेतावनी प्रणाली में भी तीन स्तर हैं, लेकिन प्रत्येक चरण का संबंध संकट को कम करने और इसे कमजोर करने की एक पूर्व-निर्धारित प्रतिक्रिया से जुड़ा हुआ है।

1980 और 1990 के दशक में दुनिया भर में अकाल राहत संगठनों के अनुभव के परिणाम स्वरूप कम से कम दो प्रमुख गतिविधियां सामने आयीं: "आजीविका का दृष्टिकोण" और किसी संकट की गंभीरता के निर्धारण के लिए पोषण संकेतकों का अधिक से अधिक इस्तेमाल. खाद्य सामग्री की तनावपूर्ण स्थितियों में व्यक्तियों और समूहों द्वारा खपत की पूर्ति सीमित कर इसका सामना करने का प्रयास किया जाएगा जो कृषि योग्य भूमि के भूखंडों को बेचने जैसे निराशाजनक उपायों को आजमाने से पहले पूरक आय आदि के वैकल्पिक माध्यम हो सकते हैं। जब स्वयं-सहायता के सभी माध्यमों का उपयोग कर लिया जाता है, तब प्रभावित आबादी भोजन की खोज में पलायन करने लगती है या पूर्ण रूप से व्यापक भुखमरी का शिकार बन जाती है। इस प्रकार अकाल को आंशिक रूप से एक सामाजिक घटना के रूप में देखा जा सकता है जिसमें बाजार, खाद्य सामग्रियों की कीमतें और सामाजिक सहायता संरचनाएं शामिल होती हैं। एक दूसरा तैयार किया गया सबक था अकाल की गंभीरता का एक मात्रात्मक मापन प्रदान करने के लिए विशेष रूप से बच्चों में तीव्र पोषण आकलनों का अधिक से अधिक उपयोग.

2004 के बाद से अकाल राहत में संलग्न कई सबसे महत्वपूर्ण संगठन जैसे कि विश्व खाद्य कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय विकास की अमेरिकी एजेंसी ने तीव्रता और परिमाण को मापने के लिए एक पंच-स्तरीय पैमाने को अपनाया है। तीव्रता का पैमाना किसी भी परिस्थिति को खाद्य सुरक्षित, खाद्य असुरक्षित, खाद्य संकट, अकाल, गंभीर अकाल और चरम अकाल के रूप में वर्गीकृत करने के लिए आजीविका के उपायों और मृत्यु दर तथा बाल कुपोषण की माप दोनों का इस्तेमाल करता है। मौतों की संख्या परिमाण के नाम का निर्धारण करती है जिसमें 1000 से कम हताहतों की संख्या एक "मामूली अकाल" को परिभाषित करती है और एक "भयावह अकाल" का नतीजा 1.000.000 से अधिक लोगों की मौतों के रूप में सामने आता है।

                                     

3.1. अकाल की कार्रवाई अकाल निवारण

पश्चिम में पायी जाने वाली आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों जैसे कि नाइट्रोजन उर्वरकों और कीटनाशकों को एशिया में लाने के प्रयासों को हरित क्रांति कहा गया जिसके परिणाम स्वरूप कुपोषण में उसी तरह की कमी आयी जैसा कि पहले पश्चिमी देशों में देखा गया था। यह मौजूदा बुनियादी ढांचे और संस्थाओं की वजह से संभव हुआ था जिनकी आपूर्ति अफ्रीका में काफी कम है जैसे कि सड़कों या सार्वजनिक बीज कंपनियों की एक प्रणाली जो बीजों को उपलब्ध कराती है। खाद्य असुरक्षा वाले क्षेत्रों में मुफ्त या अनुदानिक उर्वरकों तथा बीजों को उपलब्ध कराने जैसे उपायों के जरिये किसानों की सहायता करने से फसल कटाई में वृद्धि होती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें कम होती हैं।

विश्व बैंक और कुछ धनी देश उन देशों पर दबाव डालते हैं जो निजीकरण के नाम पर रियायती कृषि सामग्रियों जैसे कि उर्वरक में कटौती करने या इसे ख़त्म करने के क्रम में सहायता प्राप्त करने के लिए उन पर निर्भर करते हैं, इसके बावजूद कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने अपने स्वयं के किसानों को व्यापक रूप से रियायत दी है। अगर ज्यादातर नहीं तो कई किसान इतने गरीब होते हैं कि वे बाजार के मूल्यों पर उर्वरकों को खरीदने की स्थिति में नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, मलावी के मामले में इसकी 13 मिलियन आबादी में से लगभग पांच मिलियन लोगों को निरंतर आपातकालीन खाद्य सहायता की जरूरत पड़ती है। हालांकि सरकार द्वारा अपनी नीति को बदलने और उर्वरक तथा बीज के लिए रियायतें देने के बाद किसानों ने 2006 और 2007 में रिकॉर्ड-तोड़ मक्के की फसल का उत्पादन किया जिससे उत्पादन 2005 में 1.2 मिलियन की तुलना में बढ़कर 2007 में 3.4 मिलियन हो गया। इससे खाद्य सामग्री की कीमतें कम हो गयीं और कृषि श्रमिकों का पारिश्रमिक बढ़ गया। मलावी खाद्य पदार्थों का एक प्रमुख निर्यातक बन गया जो दक्षिणी अफ्रीका के किसी भी अन्य देश की तुलना में विश्व खाद्य कार्यक्रम और संयुक्त राष्ट्र को सर्वाधिक मक्के की बिक्री करने लगा। किसानों की मदद के प्रस्तावकों में अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स भी शामिल हैं जिन्होंने इस विचार का समर्थन किया है कि धनी राष्ट्रों को अफ्रीका के किसानों के लिए खाद और बीजों पर निवेश करना चाहिए।

                                     

3.2. अकाल की कार्रवाई अकाल राहत

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की व्यवस्था सुदृढ़ खाद्य पदार्थों के माध्यम से की जा सकती है। सुदृढ़ खाद्य पदार्थों जैसे कि मूंगफली मक्खन के पाउच प्लम्पी नट को देखें और स्पाइरूलीना ने मानवीय आपातकाल की स्थितियों में आपातकालीन भोजन की व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है क्योंकि इन्हें पैकेटों से सीधे खाया जा सकता है, इनके लिए पैकेट प्रशीतन या दुर्लभ स्वच्छ पानी के साथ सम्मिश्रण की आवश्यकता नहीं होती है, इन्हें वर्षों तक भंडारित किया जा सकता है और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन्हें अत्यंत गंभीर रूप से बीमार बच्चों को भी दिया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के 1974 के विश्व खाद्य सम्मेलन में स्पाइरूलीना को भविष्य के लिए सबसे अच्छा भोजन घोषित किया गया था और इसकी प्रत्येक 24 घंटे में तैयार होने वाली फसल इसे कुपोषण को मिटाने के लिए एक शक्तिशाली साधन बनाती है। इसके अलावा बच्चों में दस्त के इलाज के लिए पूरक चीजों जैसे कि विटामिन ए के कैप्सूल या जिंक की गोलियों का इस्तेमाल किया जाता है।

सहायता समूहों के बीच एक बढ़ती समझ यह है कि भूखों को सहायता प्रदान करने के लिए खाद्य सामग्री की बजाय नगदी या नगदी वाउचर देना एक किफायती, तेज और अधिक प्रभावी तरीका है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां खाद्य सामग्री उपलब्ध होती है लेकिन इसे खरीद पाना संभव नहीं होता है। संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम जो खाद्य सामग्री का सबसे बड़ा गैर-सरकारी वितरक है, इसने घोषणा की थी कि यह कुछ क्षेत्रों में खाद्य सामग्री की बजाय नगदी और वाउचरों का वितरण करना शुरू करेगा जिसे डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक जोसेट शीरन ने खाद्य सहायता के क्षेत्र में एक "क्रांति" बताया। सहायता एजेंसी कन्सर्न वर्ल्डवाइड एक मोबाइल फोन ऑपरेटर, सफारीकॉम के माध्यम से एक विधि का प्रायोगिक अध्ययन कर रही है, सफारीकॉम एक धनराशि हस्तांतरण कार्यक्रम का संचालन करती है जिसके जरिये देश के एक भाग से दूसरे भाग तक नगदी भेजने की सुविधा प्रदान की जाती है।

हालांकि एक सूखे की स्थिति में काफी दूर रहने वाले और बाजारों तक सीमित पहुंच रखने वाले लोगों के लिए खाद्य सामग्री प्रदान करना सहायता पहुंचाने का एक सबसे उपयुक्त तरीका हो सकता है। फ्रेड क्यूनी ने कहा था कि किसी राहत ऑपरेशन की शुरुआत में जिंदगियां बचाने के मौके उस स्थिति में काफी कम हो जाते हैं जब खाद्य सामग्री का आयात किया जाता है। जब तक यह देश में आता है और लोगों तक पहुंचता है, कई लोग मौत के शिकार हो चुके होते हैं।" अमेरिकी कानून जिसके लिए आवश्यकता यह है कि खाद्य सामग्री भूखों के रहने के स्थान की बजाय अपने देश से खरीदी जाए, यह अप्रभावशाली है क्योंकि जो राशि खर्च की जाती है उसका लगभग आधा हिस्सा परिवहन में चला जाता है। फ्रेड क्यूनी ने आगे ध्यान दिलाया कि "हाल के प्रत्येक अकाल के अध्ययन से पता चला है कि खाद्य सामग्री देश में ही उपलब्ध थी - हालांकि यह हमेशा खाद्य सामग्री की कमी वाले निकटवर्ती क्षेत्र में नहीं होता है" और "इसके बावजूद कि स्थानीय मानकों के अनुसार कीमतें इतनी अधिक होती हैं कि गरीब लोग इसे खरीद नहीं सकते, आम तौपर किसी दाता के लिए संचित खाद्य सामग्री को विदेश से आयात करने की बजाय बढ़ी हुई दरों में खरीदना कहीं अधिक किफायती होगा."

इथियोपिया एक ऐसे कार्यक्रम को बढ़ावा दे रहा है जो अब खाद्य संकट का सामना करने के लिए विश्व बैंक के निर्धारित नुस्खे का एक हिस्सा बन गया है और सहायता संगठनों द्वारा इसे भूखे राष्ट्रों की सबसे अच्छी तरह से सहायता करने के एक मॉडल के रूप में देखा जाने लगा था। देश के मुख्य खाद्य सहायता कार्यक्रम, प्रोडक्टिव सेफ्टी नेट प्रोग्राम के माध्यम से इथियोपिया उन ग्रामीण निवासियों को भोजन या नगदी के लिए काम करने का एक मौक़ा प्रदान करता है जो लंबे समय से भोजन की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। विदेशी सहायता संगठन जैसे कि वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम उस समय खाद्य पदार्थों की कमी वाले क्षेत्रों में वितरण के लिए आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न वाले क्षेत्रों से स्थानीय रूप से खाद्य पदार्थ खरीदने में सक्षम थे।

                                     

4. ऐतिहासिक अकाल, क्षेत्र के अनुसार

20वीं सदी के दौरान एक अनुमान के मुताबित 70 मिलियन लोग दुनिया भर में अकाल की वजह से मारे गए थे जिनमें से अनुमान के मुताबिक़ 30 मिलियन लोगों की मौत चीन में 1958-61 के अकाल के दौरान हो गई थी।

आइसलैंड 1862 से 1864 के बीच एक आलू अकाल से भी ग्रसित हुआ था। हालांकि आयरिश आलू अकाल की तुलना में इसके बारे में कम ही लोगों को पता है, आइसलैंड का आलू अकाल भी उसी बीमारी के कारण उत्पन्न हुआ था जिसने 1840 के दशक के दौरान अधिकांश यूरोप में तबाही मचाई थी। आइसलैंड की जनसंख्या का लगभग 5 प्रतिशत अकाल के दौरान मौत के मुंह में समा गया।

                                     

4.1. ऐतिहासिक अकाल, क्षेत्र के अनुसार फिनलैंड

देश ने गंभीर अकाल झेले हैं और 1696-1697 के अकाल में एक तिहाई जनसंख्या की मौत हुई। 1866-1868 के फिनलैंड के अकाल के कारण 15% जनसंख्या मौत के मुंह में समा गयी थी।

                                     

4.2. ऐतिहासिक अकाल, क्षेत्र के अनुसार आयरलैंड

इन्हें भी देखें: Great Irish famine 1845-1849 के आयरलैंड के भयंकर अकाल के लिए लॉर्ड रसैल के नेतृत्व वाली यूनाइटेड किंगडम की व्हिग सरकार की नीतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार थीं। आयरलैंड में ज्यादातर भूमि अंग्रेजी मूल के ऐंजलीकन लोगों के स्वामित्व में थी, जो सांस्कृतिक या जातीय रूप से आयरिश आबादी के साथ जुड़े नहीं थे। जमींदार एंग्लो - आयरिश के रूप में जाने जाते थे और उन्होंने अपने किरायेदारों को सहायता प्रदान करने के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करने में कोई मलाल नहीं महसूस किया और वास्तव में उन्होंने इसे अत्यधिक लाभ वाली पशु चराई के लिए और अधिक भूमि पर दावा करने की संभावना के रूप में देखा क्योंकि आयरिश लोग या तो मर गए थे या पलायन कर गए थे। आयरलैंड में खाद्य संकट की समस्या के जवाब में ब्रिटिश सरकार ने इसे पूरी तरह बाजार की ताकतों द्वारा तय करने के लिए छोड़ दिया था। वास्तव में, चूंकि अंग्रेजों ने सदियों से देशज आयरिश लोगों से बलपूर्वक जमीन हड़प ली थी, आइरिश लोगों के पास आलू की खेती के लिए रखी गई थोड़ी सी जमीन के अलावा जीवनयापन के बहुत कम साधन थे। आलू आयरिश लोगों द्वारा पैदा किया जाता था क्योंकि यह प्रति एकड़ एक बहुत ही उच्च कैलोरी वाली उपज होती है। यहां तक कि अगर आयरिश लोग अन्य फसलों को प्राप्त करने में सक्षम भी होते तो भी वे उन्हें आवंटित थोड़ी सी जमीन द्वारा पूरी आबादी की भरपाई करने में सक्षम नहीं होते, केवल आलू की फसल ही ऐसा कर सकती थी। आयरलैंड अकाल के दौरान खाद्यान्न का एक शुद्ध खाद्य निर्यातक था, जबकि ब्रिटिश सेना बंदरगाहों और भोजन डिपो को भूखी जनता से बचाने का काम करती थी।

इसका तात्कालिक प्रभाव 1.000.000 मौतें और 2.000.000 शरणार्थियों का ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में पलायन था। अकाल के बीत जाने के बाद अकाल द्वारा उत्पन्न बंजरता, जमींदारों द्वारा संचालित अर्थव्यवस्था द्वारा प्रेरित बीमारियों एवं उत्प्रवास को पूरी तरह से कम आंकना आबादी के 100 वर्ष पिछड़ने का कारण बना। आयरलैंड की आबादी, जो उस समय अकाल के पूर्व की कुल आबादी की मात्र आधी रह गयी थी, में 1970 आयलैंड के ज्यादातर भाग के स्वतंत्र होने की आधी शताब्दी बाद के बाद ही दोबारा से बढ़ोत्तरी देखी गयी। अकाल के बाद आयरिश जनसंख्या में गिरावट का यह वह काल था जब यूरोप की आबादी दुगनी और अंग्रेजों की आबादी चार गुना बढ़ी थी। इसके कारण देश में आबादी अत्यधिक कम हो गई। अकाल द्वारा देश के सर्वाधिक प्रभावित इलाकों पश्चिमी तट में आबादी में गिरावट का दौर 1990 के दशक - अर्थात अकाल तथा ब्रिटिश सरकार की अहस्तक्षेप की आर्थिक नीति के 150 वर्ष बाद - तक भी जारी रहा। अकाल के पूर्व आयरलैंड की आबादी इंग्लैंड की आबादी के आधे से थोड़ा अधिक थी। आज यह 10 % से भी कम है। आयलैंड की आबादी 5 मिलियन है लेकिन आयरलैंड से बाहर आयरिश मूल के लोगों की संख्या 80 मिलियन से अधिक है। जो कि आयरलैंड की आबादी का सोलह गुना है।

                                     

4.3. ऐतिहासिक अकाल, क्षेत्र के अनुसार रूस और सोवियत संघ

स्कॉट एवं डंकन 2002 के अनुसार, "1500 ई. से 1700 ई. के मध्य पूर्वी यूरोप ने 150 से अधिक दर्ज हुये अकाल झेले हैं, जबकि रूस में 971 ई. से 1974 ई. तक भुखमरी के 100 वर्ष और अकाल के 121 वर्ष रहे हैं।"

रूसी साम्राज्य प्रत्येक 10 से 13 वर्ष में सूखे और अकाल के लिये जाना जाता है जिसमें से सूखे का औसत प्रत्येक 5 से 7 वर्ष है। 1845 से 1922 के मध्य रूस में ग्यारह बड़े अकाल पड़े जिनमें से 1891-92 का अकाल सर्वाधिक भयंकर था। सोवियत काल में भी अकाल जारी रहे जिसमें से 1932-33 की सर्दियों में देश के विभिन्न भागों, विशेषकर वोल्गा, यूक्रेन, एवं उत्तरी कजाकिस्तान में पड़े अकालों में होलोदोमोर सर्वाधिक कुख्यात था। आज यह माना जाता है कि 1932-1933 के सोवियत अकाल में अनुमानतः 6 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। सोवियत संघ में आखिरी बड़ा अकाल वर्ष 1977 में पड़ा था जो कि भयंकर सूखे और सोवियत सरकार द्वारा अनाज भंडार के कुप्रबंधन के कारण पड़ा था।

872 दिनों की लेनिनग्राद की घेराबंदी 1941-1944 के कारण सामान्य प्रयोग की वस्तुओं, पानी, ऊर्जा और खाद्य की आपूर्ति में हुये व्यवधान के कारण लेनिनग्राद क्षेत्र में अद्वितीय अकाल पड़ा. जिसके परिणाम स्वरूप एक मिलियन लोगों की मौत हुई।

                                     
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