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ⓘ चुंडावत राजपूत के वंशज थे और ये 1700 के दशक के दौरान मेवाड़ क्षेत्र में शक्तिशाली प्रमुखों में से एक थे चुंडावत मात्र एक गुहिल वंश की शाखा मात्र ही नही थी चुंडा ..

                                     

ⓘ चुंडावत

चुंडावत राजपूत के वंशज थे और ये 1700 के दशक के दौरान मेवाड़ क्षेत्र में शक्तिशाली प्रमुखों में से एक थे

चुंडावत मात्र एक गुहिल वंश की शाखा मात्र ही नही थी चुंडावत एक समय मे मेवाड़ के सबसे अग्रणी लड़ाकू दस्ते में रहते थे जीसे हरावल दस्ता कहा जाता था आगे चलकर चुंडावतो के चार प्रमुख ठिकाने हुए वो थे सलूम्बर के कृष्णणावत, देवगढ़ के सागांवत, आमेट के जग्गावत, बेगू के मेघावत

चूण्डावतों की खांपें

चूण्डावतों की मुख्यतः 12 शाखाएं हैं किन्तु अब तक कहीं इतिहास में किसी इतिहासकार के इस और ध्यान देने और कुछ ठिकानो की संखिया कम होने की वजह से लोग अक्सर चूण्डावतों की केवल कृष्णावत, जग्गावत,सांगावत और मेघावत 4 शाखाएं होने का दावा लोग करते हैं जो की पूर्ण असत्य है l यही कारण है की बाकि अन्य शाखा वाले चूण्डावत अनजाने में अपने नजदीकी बड़े ठिकाने जो इन 4 शाखाओं में से एक हैं उसकी शाखा को अपनी शाखा बता कर अपने वास्तविक पूर्वजों का अपमान कर बैठते हैं, लेकिन अब हमने यहाँ पर इतिहास को पूरा खोल कर सबकी सुविधा के लिए सबकुछ उजागर करने की कोशिश करी है l

हम आगे चर्चा करें उससे पहले शाखाओं के महत्त्व को जान लेवें l राजपूतों में शाखाएँ बनाने के दो महत्वपूर्ण कारण हैं l सबसे पहला तो यह की शाखा को राजपूत किसी पितृ की याद में अथवा किसी बड़े कुल को बराबर बाँटने के लिए करते थे जिससे की वे अपनी पूर्व पिता को याद रख सकें अक्सर शाखा महापुरुषों की याद में लगायी जाती थी l जैसे की स्वयं रावत चूण्डा वास्तव में चूण्डावत नहीं थे अपितु सिसोदिया लाखावत थे क्यूंकि उनके वंश का नाम सिसोदिया था और पिता का नाम लाखा था l अब यही सिलसिला आगे भी रहा यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की चूण्डा जी के बाकि भाई भी लाखावत ही थे जैसे दूल्हा जी जिनके दुलावत सिसोदिया है, वही दूल्हा जी भी पिता के नाम से लाखावत ही थे l किन्तु उन्ही दुला जी के वंशज उसी प्रकार चूण्डावत नहीं हो सकते क्यूंकि दुल्हावतों में चूण्डावतों का रक्त नहीं है साथ ही कोई चूण्डावत दुल्हावत नहीं लगा सकता l अब इसी प्रकार रावत रतन सिंहजी के वंशज चूण्डावत रतनसिंहोत रहे वे कृष्णावत, संगावत, जग्गावत और मेघावत नहीं हो सकते l

सर्वप्रथम वंश होता है सिसोदिया, तत्पश्चात कुल चूण्डावत, उसके बाद खांप, उसके बाद आता है नख यह अक्सर विस्तृत और बहुत बड़े फ़ैल चुकी खांप में ही देखा जाता है अन्यथा नहीं इससे आप अनुमान लगा सकते हैं की हमारे पूर्वज कितने बुद्धिमान होते थे विवाह सम्बन्ध आदि सन्दर्भ में l बाकि यह सिर्फ हमारा ही अभिमान है जिसने उनकी स्थापित व्यवस्था को गलत अर्थ में उपयोग में लाये और समाज में विघटन हो गया l नीचे हमने इसी का एक चित्र भी दिया है देखें -

अब जानिए की यह व्यवस्था क्यूँ स्थापित हुई l सभी चूण्डावत वस्तुतः सिसोदिया हैं, और उससे उपर उठ कर सोचो तो हम सब सिसोदिया नहीं वरण एक महान हिन्दू साम्राज्य का एक मजबूत स्तम्भ हैं जिसे लोग वीर राजपूत वर्ण कहते हैं। तो फिर हूँ चूण्डावत क्यूँ हैं? हम सिसोदिया क्यूँ हैं? सभी राजपूत क्यूँ नहीं लिख सकते? इसका भी कारण वैज्ञानिक है की समस्त हिन्दु समाज और उसके एक अंग राजपूतों में हमेशा से ही दूर के परिवार में रिश्ता करने की व्यवस्था रही है जो की परंपरा की आड़ में हमारे मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अतियंत आवश्यक रही है, इसका नाम मेवाड़ी में साख पल्टियो कहते हैं l अर्थात यदि किसी राठौवर की शादी किसी चौहान वधु से हो रही हो और यदि दोनों के ननिहाल पक्ष या फूल नहिहल माता का ननिहाल एक हो जैसे की चूण्डावत हो तो विवाह करना परम्परानुकुल असंभव है क्यूंकि उससे न तो महान संतान उत्पन्न होगी और साथ ही वह नजदीकी रिश्तेदार होने के नाते राजपूत निति के अनुसार दूर के भाई-बहन ही कहलाते हैं l किन्तु यदि उनके ननिहाल में भिन्न शाखा होगी साख पल्टियो तो वह विवाह हो सकता है, जैसे की राठोड वर जग्गावत चूण्डावातों का भाणेज हो और वधु सांगावत चूण्डावातों की भाणेज हो l

अब सभी को यह भी मान लेना चाहिए की यदि शाखाओं को उचित तरीके से नहीं जाना और समझा जायेगा तो अच्छे रिश्ते होने से बच सकते हैं और अनुचित रिश्ते गलती से हो भी सकते हैं l जैसे की यदि राठोड वर कृष्णावतठि.साटोला चूण्डावतों का भाणेज है और चौहान वधु भी चूण्डावतोंभरचड़ी की ही भाणेज है जो की गलती से स्वयं को भी कृष्णावत चूण्डावत ही समझ रहे थे, तो यह जानने के पश्चात् दोनों परिवार साख पल्टी नहीं होने की वजह से यह रिश्ता यही छोड़ देंगे l किन्तु यदि उनको यह पता हो की ठि.भरचड़ी के चूण्डावत तो वास्तव में आसावत चूण्डावत है जो की चूण्डा जी के सबसे छोटे पुत्र आसाजी के वंशज हैं और कृष्णदास जी से 4 पीढ़ी पहले ही हुए थे और रावत कृष्णदास चूण्डावत के काका शाख में आते हैं और उनमे कृष्णदास जी का अंश नहीं है l इस भारी चूक या कहो अज्ञानता की वजह से एक अच्छा रिश्ता होते होते छूट सकता है l जिन्हें ज्ञान है वे ही इस गलती से बच सकते हैं l किन्तु कुछ चूण्डावत तो गर्व के लिए अपने नजदीकी बड़े ठिकाने अमेट, देवगढ या फिर सलूम्बर को अपना शाख भाई मान लेते हैं l

शाखाओं का सदुपयोग कुल में वृद्धि करा सकता है जैसा की हमने उपर बताया, किन्तु साथ ही यदि शाखाओं को अभिमान और फूट के लिए प्रयोग किया जाये तो इससे भी कुल में बिखराव आ जाता है l सभी चूण्डावत सिसोदिया केवल चूण्डावत है बाकि जो उपशाखा या नख होते हैं वे केवल विवाह में सहूलियत के लिए परंपरागत अपनाये गए हैं इसके अतिरिक्त कोई लाभ/अर्थ नहीं है l आजकल अक्सर कई चूण्डावत अपने मूल शाखा जो की चूण्डावत ही है, इसको लगाने की बजाये सीधे सीधे उपशाखा लगाने लगे हैं जो की पूर्ण रूप से अनुचित हैं l इनमे अक्सर यह प्रभाव कृष्णावत चूण्डावतों में है और कुछ कुछ आजकल जग्गावत और सांगावत चूण्डावत भी लगाने लगे हैं l यहाँ हम कोई विवाद या बहस खड़ा करने की बजाये बता देवें की रावत चूण्डा जी के परम पाटवी वंशज आज भी केवल चूण्डावत ही लगते हैं जो की स्वयं भी कृष्णावत - खंगारोत - रतनसिंहोत -कंधालोत आदि कई शाखाएँ तो वैसे ही समायी हैं l उपशाखा लगाने से फूट ही पढ़ती है और केवल अभिमान दर्शाता है और कुछ नहीं l एक बार गलत रास्ता अपनाने के बाद पुनः पीछे मुड़ना उचित न जान कर अक्सर कई ठिकानो के सरदार यह सफाई देते हैं की वे तो कई पीढ़ियों से ऐसा कर रहें है इसमें क्या गलत है l किन्तु फिर भी निर्णय आपके हाथ में ही है हम केवल मार्ग ही दर्शा सकते हैं l इसी प्रकार अन्य सभी राजपूतों के कुल के नाम तक भी जैसे सिसोदिया-राठोड-चौहान-झाला-भाटी ये सब विवाह की सहुलियत के लिए हैं वास्तविकता तो यही है की हम सब केवल राजपूत हैं l इसी बात को ध्यान रखते हुए चूण्डावतों को भी यह ध्यान रखना चाहिए की हम सब सिसोदिया हैं राजपूत हैं।

चूण्डावातों की शाखाएँ -:

1) कृष्णावत - ठि.सलूम्बर

2) जग्गावत - ठि.आमेट

3) सांगावत - ठि.देवगड़

4) मेघावत - ठि.बेगूँ

5) रतनसिंहोत रत्नावत - ठि.साकरिया खेडी, ठि.देवाली, ठि.पिपलोदा, ठि.हरेर, ठि.भोजपुर

6) कांधलोत - ठि.गोगाथल और ठि.पाखंड

7) खेंगारोत - ठि.लाखराज, ठि.पालनखेड़ी, ठि. खेड़ा सलूम्बर के पास, ठि. सियालकुंड

8) कुंतलोत - ठि.भरख, ठि.परावल

9) तेजसिंहोत तेजावत - ठि.सूर्यगड़, ठि.लिम्बोद, ठि.बेगूँ, ठि.कनेरा, ठि.बस्सी

10) मांजावत - कटाऔर सलूम्बर के पास के कुछ ठिकाने

11) आसावत - ठि.भरचड़ी

12) रणधीरोत - ठि.काटून्द

                                     
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