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ⓘ ॐ. ओ३म् या ओंकार का नामान्तर प्रणव है। यह ईश्वर का वाचक है। ईश्वर के साथ ओंकार का वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध नित्य है, सांकेतिक नहीं। संकेत नित्य या स्वाभाविक संबंध ..

ॐ
                                     

ⓘ ॐ

ओ३म् या ओंकार का नामान्तर प्रणव है। यह ईश्वर का वाचक है। ईश्वर के साथ ओंकार का वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध नित्य है, सांकेतिक नहीं। संकेत नित्य या स्वाभाविक संबंध को प्रकट करता है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ओंकाररूपी प्रणव का ही स्फुरण होता है। तदनंतर सात करोड़ मंत्रों का आविर्भाव होता है। इन मंत्रों के वाच्य आत्मा के देवता रूप में प्रसिद्ध हैं। ये देवता माया के ऊपर विद्यमान रह कर मायिक सृष्टि का नियंत्रण करते हैं। इन में से आधे शुद्ध मायाजगत् में कार्य करते हैं और शेष आधे अशुद्ध या मलिन मायिक जगत् में। इस एक शब्द को ब्रह्मांड का सार माना जाता है, 16 श्लोकों में इसकी महिमा वर्णित है।

                                     

1. परिचय

ब्रह्मप्राप्ति के लिए निर्दिष्ट विभिन्न साधनों में प्रणवोपासना मुख्य है। मुण्डकोपनिषद् में लिखा है:

प्रणवो धनु:शरोह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥

कठोपनिषद में यह भी लिखा है कि आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है। उसके आलोक से निगूढ़ आत्मतत्व का साक्षात्कार होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है। मांडूक्योपनिषत् में भूत, भवत् या वर्तमान और भविष्य–त्रिकाल–ओंकारात्मक ही कहा गया है। यहाँ त्रिकाल से अतीत तत्व भी ओंकार ही कहा गया है। आत्मा अक्षर की दृष्टि से ओंकार है और मात्रा की दृष्टि से अ, उ और म रूप है। चतुर्थ पाद में मात्रा नहीं है एवं वह व्यवहार से अतीत तथा प्रपंचशून्य अद्वैत है। इसका अभिप्राय यह है कि ओंकारात्मक शब्द ब्रह्म और उससे अतीत परब्रह्म दोनों ही अभिन्न तत्व हैं।

वैदिक वाङ्मय के सदृश धर्मशास्त्र, पुराण तथा आगम साहित्य में भी ओंकार की महिमा सर्वत्र पाई जाती है। इसी प्रकार बौद्ध तथा जैन सम्प्रदाय में भी सर्वत्र ओंकार के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति देखी जाती है। प्रणव शब्द का अर्थ है– प्रकर्षेणनूयते स्तूयते अनेन इति, नौति स्तौति इति वा प्रणव:।

प्रणव का बोध कराने के लिए उसका विश्लेषण आवश्यक है। यहाँ प्रसिद्ध आगमों की प्रक्रिया के अनुसार विश्लेषण क्रिया का कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है। ओंकार के अवयवों का नाम है–अ, उ, म, बिन्दु, अर्धचंद्र रोधिनी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिनी या महाशून्य, समना तथा उन्मना। इनमें से अकार, उकाऔर मकार ये तीन सृष्टि, स्थिति और संहार के सपादक ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र के वाचक हैं। प्रकारांतर से ये जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण अवस्थाओं के भी वाचक हैं। बिन्दु तुरीय दशा का द्योतक है। प्लुत तथा दीर्घ मात्राओं का स्थितिकाल क्रमश: संक्षिप्त होकर अंत में एक मात्रा में पर्यवसित हो जाता है। यह ह्रस्व स्वर का उच्चारण काल माना जाता है। इसी एक मात्रा पर समग्र विश्व प्रतिष्ठित है। विक्षिप्त भूमि से एकाग्र भूमि में पहुँचने पर प्रणव की इसी एक मात्रा में स्थिति होती है। एकाग्र से निरोध अवस्था में जाने के लिए इस एम मात्रा का भी भेद कर अर्धमात्रा में प्रविष्ट हुआ जाता है। तदुपरांत क्रमश: सूक्ष्म और सूक्ष्मतर मात्राओं का भेद करना पड़ता है। बिन्दु अर्धमात्रा है। उसके अनंतर प्रत्येक स्तर में मात्राओं का विभाग है। समना भूमि में जाने के बाद मात्राएँ इतनी सूक्ष्म हो जाती हैं कि किसी योगी अथवा योगीश्वरों के लिए उसके आगे बढ़वा संभव नहीं होता, अर्थात् वहाँ की मात्रा वास्तव में अविभाज्य हो जाती है। आचार्यो का उपदेश है कि इसी स्थान में मात्राओं को समर्पित कर अमात्र भूमि में प्रवेश करना चाहिए। इसका थोड़ा सा आभास मांडूक्य उपनिषद् में मिलता है।

बिन्दु मन का ही रूप है। मात्राविभाग के साथ-साथ मन अधिकाधिक सूक्ष्म होता जाता है। अमात्र भूमि में मन, काल, कलना, देवता और प्रपंच, ये कुछ भी नहीं रहते। इसी को उन्मनी स्थिति कहते हैं। वहाँ स्वयंप्रकाश ब्रह्म निरंतर प्रकाशमान रहता है।

योगी संप्रदाय में स्वच्छन्द तंत्र के अनुसार ओंकारसाधना का एक क्रम प्रचलित है। उसके अनुसार "अ" समग्र स्थूल जगत् का द्योतक है और उसके ऊपर स्थित कारणजगत् का वाचक है मकार। कारण सलिल में विधृत, स्थूल आदि तीन जगतों के प्रतीक अ, उ और म हैं। ऊर्ध्व गति के प्रभाव से शब्दमात्राओं का मकार में लय हो जाता है। तदनंतर मात्रातीत की ओर गति होती है। म पर्यत गति को अनुस्वार गति कहते हैं। अनुस्वार की प्रतिष्ठा अर्धमात्रा में विसर्गरूप में होती है। इतना होने पर मात्रातीत में जाने के लिए द्वार खुल जाता है। वस्तुत: अमात्र की गति बिंदु से ही प्रारंभ हो जाती है।

तंत्र शास्त्र में इस प्रकार का मात्राविभाग नौ नादों की सूक्ष्म योगभूमियां के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि बिंदु अशेष वेद्यों के अभेद ज्ञान का ही नाम है और नाद अशेष वाचकों के विमर्शन का नाम है। इसका तात्पर्य यह है कि अ, उ और म प्रणव के इन तीन अवयवों का अतिक्रमण करने पर अर्थतत्व का अवश्य ही भेद हो जाता है। उसका कारण यह है कि यहाँ योगी को सब पदार्थो के ज्ञान के लिए सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जाता है एवं उसके बाद बिंदुभेद करने पर वह उस ज्ञान का भी अतिक्रमण कर लेता है। अर्थ और ज्ञाइन दोनों के ऊपर केवल नाद ही अवशिष्ट रहता है एवं नाद की नादांत तक की गति में नाद का भी भेद हो जाता है। उस समय केवल कला या शक्ति ही विद्यमान रहती है। जहाँ शक्ति या चित् शक्ति प्राप्त हो गई वहाँ ब्रह्म का प्रकाशमान होना स्वत: ही सिद्ध है।

इस प्रकार प्रणव के सूक्ष्म उच्चारण द्वारा विश्व का भेद होने पर विश्वातीत तक सत्ता की प्राप्ति हो जाती है। स्वच्छंद तंत्र में यह दिखाया गया है कि ऊर्ध्व गति में किस प्रकार कारणों का परित्याग होते होते अखंड पूर्णतत्व में स्थिति हो जाती है। "अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। "उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का वाचक है ओर उसका त्याग तालुमध्य में होता है। इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है। तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है अर्थात् बिंदु से क्रमश: ऊपर की ओर वाच्यवाचक का भेद नहीं रहता। भ्रूमध्य में बिंदु का त्याग होता है। नाद सदाशिवरूपी है। ललाट से मूर्धा तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है। यहाँ तक का अनुभव स्थूल है। इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं। मूर्धा के ऊपर स्पर्शनुभूति के अनंतर शक्ति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर व्यापिनी का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है। यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है। इसके उपरांत कुछ समय तक मन के अतीत विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दीख पड़ती है। इसके अनंतर ही परमानुग्रहप्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में प्रवेश होता है।

इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती है।

                                     

2. ओंकार

नानक क्यों कहते हैं

गुरु नानक जी का शब्द एक ओंकार सतनाम बहुत प्रचलित तथा शत्प्रतिशत सत्य है। एक ओंकार ही सत्य नाम है। राम, कृष्ण सब फलदायी नाम ओंकापर निहित हैं तथा ओंकार के कारण ही इनका महत्व है। बाँकी नामों को तो हमने बनाया है परंतु ओंकार ही है जो स्वयंभू है तथा हर शब्द इससे ही बना है। हर ध्वनि में ओउ्म शब्द होता है।

महत्व तथा लाभ

ओउ्म तीन शब्द अ उ म से मिलकर बना है जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भूर्भुव: स्व: भूलोक भुव: लोक तथा स्वर्ग लोक का प्रतीक है।

लाभ

पद्माशन में बैठ कर इसका जप करने से मन को शांति तथा एकाग्रता की प्राप्ति होती है, वैज्ञानिकों तथा ज्योतिषियों को कहना है कि ओउ्म तथा एकाक्षरी मंत्र का पाठ करने में दाँत, नाक, जीभ सब का उपयोग होता है जिससे हार्मोनल स्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्राव को कम करके यह शब्द कई बीमारियों से रक्षा तथा शरीर के सात चक्र कुंडलिनी को जागृत करता है।

                                     

3. विवेचना

तस्य वाचकः प्रणवः उस ईश्वर का वाचक प्रणव ॐ है।

अक्षरका अर्थ जिसका कभी क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों - अ उ और म से मिलकर बना है ॐ। माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसे सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है। हमारी और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है। यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है। माना गया है कि अत्यन्त पवित्और शक्तिशाली है ॐ। किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है, जैसे, श्रीराम का मंत्र - ॐ रामाय नमः, विष्णु का मंत्र - ॐ विष्णवे नमः, शिव का मंत्र - ॐ नमः शिवाय, प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नहीं होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव परमेश्वर है। "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।

छान्दोग्योपनिषद् में ऋषियों ने गाया है -

ॐ इत्येतत् अक्षरः अर्थात् ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।

ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है। मात्र ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई।

गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च

श्रीमद्भागवत् में ॐ के महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। इसके आठवें अध्याय में उल्लेख मिलता है कि जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है।

ॐ अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है। अ उ म्। "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना। ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है। ॐ में प्रयुक्त "अ" तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं "उ" उड़ने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है "ऊर्जा" सम्पन्न होना। किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थल जाने पर वहाँ की अगाध ऊर्जा ग्रहण करने के बाद व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को आकाश में उड़ता हुआ देखता है। मौन का महत्व ज्ञानियों ने बताया ही है। अंग्रजी में एक उक्ति है - "साइलेंस इज़ सिल्वर ऍण्ड ऍब्सल्यूट साइलेंस इज़ गोल्ड"। श्री गीता जी में परमेश्वर श्रीकृष्ण ने मौन के महत्व को प्रतिपादित करते हुए स्वयं को मौनका ही पर्याय बताया है -

मौनं चैवास्मि गुह्यानां

"ध्यान बिन्दुपनिषद्" के अनुसार ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता।

तैत्तिरीयोपनिषद शिक्षावल्ली अष्टमोऽनुवाकः में ॐ के विषय में कहा गया हैः-

ओमिति ब्रह्म । ओमितीदँसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥

अर्थातः- ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी जगत की अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ --,

अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते। तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ७॥ -- प्रश्नोपनिषद प्रश्न ५, श्लोक ७,

अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर श्रेष्ठ है।

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत॥ --

अर्थातः- प्रणव धनुषहै, सोपाधिक आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।। ४।।

ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत, भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव॥ १॥ -- माण्डूक्योपनिषद, गौ० का० श्लोक १

अर्थातः-ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।

सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।। ८।। -- माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८

वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकाऔर मकार हैं।

सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ॐ को महत्व प्राप्त है। बौद्ध-दर्शन में "मणिपद्मेहुम" का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार ॐ को "मणिपुर" चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ॐ के महत्व को दर्शाया गया है। महात्मा कबीर र्निगुण सन्त एवं कवि थे। उन्होंने भी ॐ के महत्व को स्वीकारा और इस पर "साखियाँ" भी लिखीं -

ओ ओंकार आदि मैं जाना। लिखि औ मेटें ताहि ना माना ॥ ओ ओंकार लिखे जो कोई। सोई लिखि मेटणा न होई ॥

गुरु नानक ने ॐ के महत्वको प्रतिपादित करते हुए लिखा है -

ओम सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त यानी ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष के" सदृश हो जाता है।

"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है एवं मनुष्य के अन्तर में स्थित ईश्वर का प्रतीक।

                                     
  • उच च रण क स थ क य ज ए ॐ भ ॐ भ व ॐ स व ॐ मह ॐ जन ॐ तप ॐ सत यम ॐ तत सव त र वर ण य भर ग द वस य ध मह ध य य न प रच दय त ॐ आप ज य त रस ऽम त
  • ॐ नम श व य IAST: Om Namaḥ Śivāya सबस ल कप र य ह द म त र म स एक ह और श व सम प रद य क महत वप र ण म त र ह नम श व य क अर थ भगव न श व क
  • ह कर अन य परम पर म न य ॐ बन य ज न लग इसक द ष पर ण म स वर प हम ल ग ज न परम पर द व र म न य च ह न क प र य: भ ल गए ह और ॐ क ह भ रमवश ज न परम पर
  • ॐ सर व श य नम ॐ स म य य नम ॐ स रवन द य य नम ॐ स रल कव ह र ण नम ॐ स ख सन पव ष ट य नम ॐ स न दर य नम ॐ घन य नम ॐ घनर प य नम ॐ घन भरणध र ण
  • नम ॐ स र य य नम ॐ भ नव नम ॐ खग य नम ॐ प ष ण नम ॐ ह रण यगर भ य नम ॐ मर चय नम व मर च न नम: - मर च न यह स र य क एक न म ह ॐ आद त य य
  • स ष ट क समस त मन ष य क करन च ह ए ॐ जय श व ओ क र भ ल हर श व ओ क र ब रह म व ष ण सद श व अर द ध ग ध र ॐ हर हर हर मह द व... एक नन चत र नन प च नन
  • ॐ मण पद म ह म एक प ल म त र ह ज सक स ब ध अवल क त श वर कर ण क ब ध सत त व स ह यह त ब बत ब द ध धर म क म ल म त र ह यह प र य पत थर पर ल ख
  • प ठ क य ज त ह ॐ प र णमद प र णम दम प र ण त प र णम दच यत प र णस य प र णम द य प र णम व वश ष यत ॐ श न त श न त श न त ॐ श न म त र श वर ण
  • स थ न बन ॐ व ष टर व ष टर व ष टर प रत ग ह यत म - प र ग स वर कन य क प त क ह थ स व ष टर क श य प ष प आद ल कर कह - ॐ प रत ग ह ण म
  • भगव ण धन व तर क स धन क ल य एक स ध रण म त र ह ॐ धन व तरय नम इसक अल व उनक एक और म त र भ ह ॐ नम भगवत मह स दर शन य व स द व य धन व तर य अम तकलश
  • वक त रम ॐ श न त श न त श न त क ष णयज र व द मन त र: ॐ सह न ववत सह न भ नक त सह व र य करव वह त जस व न वध तमस त म व द व ष वह
                                     
  • ॐ स द ध व न यक य नम सरस वत : ॐ सरस वत य नम लक ष म : ॐ मह लक ष म य नम द र ग : ॐ द र ग य नम मह व ष ण : ॐ श र व ष णव नम or ॐ नम
  • इस उपन षद क श न त प ठ न म न ह ॐ सह न ववत सह न भ नक त सह व र य करव वह त जस व न वध तमस त म व द व ष वह ॐ श न त श न त श न त यह उपन षद
  • व व ह स स क र स सम पन न कर ए तत पश च त ॐ गन धद व र द र धर ष .......... प ... स त लक लग ए तथ ॐ अक षन नम मदन त .... प .. स अक षत
  • अन त त सत यम प म ॐ व यव नम ॐ स यर व रतपत व रत चर ष य म तत त प रब रव म तच छक यम त नध य र सम दमहम अन त त सत यम प म ॐ स य र य नम ॐ चन द र व रतपत
  • उपन षद क श न त प ठ न म न ह ॐ प र णमद प र णम दम प र ण त प र णम दच यत प र णस य प र णम द य प र णम व वश ष यत ॐ श न त श न त श न त इस उपन षद
  • व द ध क ल ए पहल स क ष - ॐ एक व ष ण जर गत सर व व य प त य न चर चरम ह दय यस तत यस य, तस य स क ष प रद यत म पहल चरण - ॐ इष एकपद भव स म मन व रत
  • न श चय प व ॐ जय ब हस पत द व ॐ जय जगद श हर ॐ जय जगद श हर स व म जय जगद श हर भक त द स जन क स कट, क षण म द र कर ॐ जय जगद श हर .
  • ईश पन षद म यह आय ह - ॐ प र णमद प र णम द प र ण त प र णम दच यत प र णस य प र णम द य प र णम व वश ष यत ॐ श त श त श त ॐ वह परब रह म प र ण
  • व व कश ल बन ग ॐ गण न त व गणपत हव मह प र य ण त व प र यपत हव मह न ध न त व न ध पत हव मह वस मम आहमज न गभर धम त वमज स गभर धम ॐ गणपतय नम
                                     
  • सम प त क ज त ह ॐ यज ञ न यज ञमयजन त द व स त न धर म ण प रथम न य सन त ह न क मह म न सचन त यत र प र व स ध य सन त द व 1 ॐ र ज ध र ज य प रसह यस ह न
  • कर द य ज त ह श र झ ल ल ल क आरत ॐ जय द लह द व स ई जय द लह द व प ज कन थ प र म स द क रख स व ॐ जय... त ह ज दर द क ई सजण अचन सव ल
  • ग यत र म त र क जप - अन ष ठ न द क य ज त ह ग यत र म त र इस प रक र ह - ॐ भ र भ व स व तत सव त र वर ण यम भर ग द वस य ध मह ध य य न प रच दय त
  • स थ क य ज न च ह य ॐ भ भ व ॐ स व ॐ मह ॐ जन ॐ तप ॐ सत यम ॐ तत सव त र वर ण य भर ग द वस य ध मह ध य य न प रच दय त ॐ आप ज य त रस ऽम त ब रह म
  • क उपय ग ह न द श व शक त ब द ध और ज न धर म म क य ज त ह इसम ॐ और ह क स ग र म षटक ण त र क म श र त आक र ह अनहत य ह रदय चक र म ह क स ग र म
  • मन म श व स च र ब र ॐ मन म ब लकर अथव क स भ ईष ट क न म ल कर अ दर भर अ दर आन क ब द प र व स द गन अर थ त 8 ब र ॐ य क ई न म ल न ज तन
  • प र णव न बन रह ह ॐ आप ह ष ठ मय भ व त नऽऊर ज दध तन, मह रण य चक षस ॐ य व श वतम रस तस य भ जयत ह न उशत र व म तर ॐ तस म ऽअर गम मव यस य
  • ह ग ॐ च द र प ण मह म य द व यत ज समन व त त ष ठ द व श ख मध य तज व द ध क र ष व म - स प र म ण डन क य ह ए मस त ष क पर स वस त क य ॐ शब द
  • आरम भ द वत क नमस क र अथव ग र क ल य प रम ण स ह त ह ज स ॐ नम म जज घ ष य अथव ॐ ग रव नम इत य द स स क त ग रन थ क ल य म ग ल ल ग क प ज
  • यज ञ क स त त म यजम न द व र ग य ज त थ ॐ असत म सद गमय तमस म ज य त र गमय म त य र म म त गमय ॐ श न त श न त श न त ब हद रण यक पन षद

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