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ⓘ २०१० से प्रारंभ होने वाली अरब जगत की क्रांतिकारी लहर. मध्य पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन एवं धरना का दौर २०१० मे आरंभ हुआ, इस ..


२०१० से प्रारंभ होने वाली अरब जगत की क्रांतिकारी लहर
                                     

ⓘ २०१० से प्रारंभ होने वाली अरब जगत की क्रांतिकारी लहर

मध्य पश्चिमी एशिया एवं उत्तरी अफ्रीका में श्रृखंलाबद्ध विरोध-प्रदर्शन एवं धरना का दौर २०१० मे आरंभ हुआ, इसे अरब जागृति, अरब स्प्रिंग या अरब विद्रोह कहतें हैं। अरब स्प्रिंग, क्रान्ति की एक ऐसी लहर थी जिसने धरना, विरोध-प्रदर्शन, दंगा तथा सशस्त्र संघर्ष की बदौलत पूरे अरब जगत के संग समूचे विश्व को हिला कर रख दिया।

इसकी शुरूआत ट्यूनीशिया में १८ दिसमबर २०१० को मोहम्मद बउज़िज़ी Md. Bouazizi के आत्मदाह के साथ हुई। इसकी आग की लपटें पहले-पहल अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन और यमन पहुँची जो शीघ्र ही पूरे अरब लीग एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई। इन विरोध प्रदर्शनो के परिणाम स्वरूप कई देशों के शासकों को सत्ता की गद्दी से हटने पर मजबूर होना पड़ा। बहरीन, सीरिया, अल्जीरिया, ईरक, सुडान, कुवैत, मोरक्को, इजरायल में भारी जनविरोध हुए, तो वही मौरितानिया, ओमान, सऊदी अरब, पश्चिमी सहारा तथा पलीस्तिन भी इससे अछूते न रहे।

हालाँकि यह क्रान्ति अलग-अलग देशों में हो रही थी, परंतु इनके विरोध प्रदर्शनो के तौर-तरीके में कई समानता थी - हड़ताल, धरना, मार्च एवं रैली। अमूमन, शुक्रवार जिसे आक्रोश का दिन भी कहा जाता को विशाल एवं संगठित भारी विरोध प्रदर्शन होता, जब जुमे की नमाज़ अदा कर सड़कों पर आम नागरिक इकठ्ठित होते थे। सोशल मीडिया का अरब क्रांति में अनोखा एवं अभूतपूर्व योगदान था। एक बेहद ही ढ़ाँचागत तरीके से दूर-दराज के लोगों को क्रांति से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल हुआ।

अरब सप्रिङ के क्रन्तिकारियों को सरकार, सरकार-समर्थित हथियारबंद लड़ाके एवं अन्य विरोधियों से दमन का सामना करना पड़ा, लेकिन ये अपने नारे Ash-sha`b yurid isqat an-nizam अंग्रेज़ी में - "the people want to bring down the regime"; हिन्दी में - जनता की पुकार-शासन का खात्मा हो के साथ आगे बढ़ते रहें।

अरब क्रांति ने पूरी दुनिया का आकर्षण अपनी ओर खींचा। तवाकोल करमान Tawakkol Karman, यमनवासी, अरब स्प्रिङ के प्रमुख योद्धाओं में एक, २०११ शान्ति नोबल पुरस्कार विजेता थी। दिसमबर २०११ में टाईम पत्रिका ने अरब विरोधियों को द परसन ऑफ द ईयर The Person of the Year की खिताब से नवाजा।

                                     

1. कारण

विशेषज्ञों के मुताबिक अरब स्प्रिङ की मुख्य वजह आम जनता की वहाँ की सरकारों से असंतोष एवं आर्थिक असमानता थीं। इनके अलावा तानाशाही, मानवाधिकार उल्लंघन, राजनैतिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बदहाल अर्थ-व्यवस्था एवं स्थानीय कारण भी प्रमुख थे। कुछ जानकरों - जैसे स्लोवेनियाई दार्शनिक, Slavoj Žižek के मुताबिक २००९-२०१० ईरान के चुनाव पर विरोध प्रदर्शन को भी एक कारण माना जाता है। संभवतः २०१० की किरगिज़ क्रांति ने अरब स्प्रिङ को सुलगाने का काम किया।

उत्तरी अफ्रीका एवं खाड़ी के देशों में दशकों से सत्ता पे काबिज निरंकुश शासक अकूत संपत्ति जमा किए हुए थे तथा सरकार में व्यापक स्तर पर भ्रष्टचार फैली हुई थी जो वहाँ के नौजवानों को नागवार गुजर रहा था। इन सबके बीच आसमान छूती खाद्य मूल्य एवं तुरंत-तुरंत आती अकाल ने जन-असंतोष को चरम पर पहुँचा दिया।

ट्यूनीशिया में मोहम्मद बउज़िज़ी Md. Bouazizi ने पुलिस भ्रष्टाचार एवं दुर्व्यव्हार से त्रस्त हो आत्मदाह कर लिया। इनकी मृत्यु ने सरकार से असंतुष्ट वर्गों को एक करने का काम किया और सरकार विरौधी प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया, जिसमें समाज का हर तबका शामिल था। ट्यूनीशिया की इस घटना के बाद अरब जगत में अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ जन-विरोध प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया।

                                     

2. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं

अरब स्प्रिंग से प्रभावित देशों में विरोध प्रदर्शनों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का काफ़ी ध्यान अपनी ओर खींचा है, जबकि कठोर प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं की निंदा की गई है। बहरैनी, मोरक्कन और सीरियाई विरोध प्रदर्शनों के सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया काफ़ी सूक्ष्म रही है। कुछ आलोचकों ने फ्रांस, ब्रिटेन, अमरीका सहित कई पश्चिमी सरकारों पर अरब स्प्रिंग पर नकली प्रतिक्रियाओं के आरोप लगाये हैं। नोआम चोम्स्की ने ओबामा प्रशासन पर क्रान्तिकारी लहर को ढंकने और मध्य-पूर्व में लोकतंत्रीकरण के प्रयासों को दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में अशांति की वज़ह से तेल की कीमतें पूर्वानुमानित कीमतों से अधिक होने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि ये क्षेत्र तेल उत्पादन के लिए महत्त्वपूर्ण है। दिसंबर २०१० से वैश्विक निवेशकों ने MENA क्षेत्र की कंपनियों में अपना निवेश काफ़ी घटा दिया है जिसके कारण क्षेत्र के शेयर सूचकांक में भारी गिरावट आई है।

केनन इंजिन नाम के एक जर्मन-कुर्दिश राजनीतिज्ञ ने लातिन अमरीका में १९७० और १९८० के दशकों की "लोकतंत्र की तीसरी लहर" से स्पष्ट रूप से मिलती-जुलती गुणात्मक विशेषताओं के कारण अरब और इस्लामी देशों में उठे विद्रोह को "लोकतंत्र की तीसरी लहर" के रूप में पहचाना है।

                                     
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