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ⓘ समय मापन का इतिहास. अति प्राचीन काल में मनुष्य ने सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं के आधार प्रात, दोपहर, संध्या एवं रात्रि की कल्पना की। ये समय स्थूल रूप से प्रत्यक्ष ..


समय मापन का इतिहास
                                     

ⓘ समय मापन का इतिहास

अति प्राचीन काल में मनुष्य ने सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं के आधार प्रात, दोपहर, संध्या एवं रात्रि की कल्पना की। ये समय स्थूल रूप से प्रत्यक्ष हैं। तत्पश्चात् घटी पल की कल्पना की होगी। इसी प्रकार उसने सूर्य की कक्षागतियों से पक्षों, महीनों, ऋतुओं तथा वर्षों की कल्पना की होगी। समय को सूक्ष्म रूप से नापने के लिए पहले शंकुयंत्र तथा धूपघड़ियों का प्रयोग हुआ। रात्रि के समय का ज्ञान नक्षत्रों से किया जाता था। तत्पश्चात् पानी तथा बालू के घटीयंत्र बनाए गए। ये भारत में अति प्राचीन काल से प्रचलित थे। इनका वर्णन ज्योतिष की अति प्राचीन पुस्तकों में जैसे पंचसिद्धांतिका तथा सूर्यसिद्धांत में मिलता है। पानी का घटीयंत्र बनाने के लिए किसी पात्र में छोटा सा छेद कर दिया जाता था, जिससे पात्र एक घंटी में पानी में डूब जाता था। उसके बाहरी भाग पर पल अंकित कर दिए जाते थे। इसलिए पलों को पानीय पल भी कहते हैं। बालू का घटीयंत्र भी पानी के घटीयंत्र सरीखा था, जिसमें छिद्र से बालू के गिरने से समय ज्ञात होता था। किंतु ये सभी घटीयंत्र सूक्ष्म न थे तथा इनमें व्यावहारिक कठिनाइयाँ भी थीं। विज्ञान के प्रादुर्भाव के साथ लोलक घड़ियाँ तथा तत्पश्चात् नई घड़ियाँ, जिनका हम आज प्रयोग करते हैं, अविष्कृत हुई।

जैसा पहले बता दिया गया है, समय का ज्ञान सूर्य की दृश्य स्थितियों से किया जाता है। सामान्यत: सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन तथा सूर्यास्त से पुन: सूर्योदय तक रात्रि होती हैं, किंतु तिथिगणना के लिए दिन-रात मिलकर दिन कहलाते हैं। किसी स्थान पर सूर्य द्वारा याम्योत्तर वृत्त के अधोबिंदु की एक परिक्रमा को एक दृश्य दिन कहते हैं, तथा सूर्य की किसी स्थिर नक्षत्र के सापेक्ष एक परिक्रमा को नाक्षत्र दिन कहते हैं। यह नक्षत्र रूढ़ि के अनुसार माप का आदि बिंदु first point of Aries i. e. g, अर्थात् क्रांतिवृत्त तथा विषुवत् वृत्त का वसंत संपात बिंदु लिया जाता है। यद्यपि नाक्षत्र दिन स्थिर है, तथापि यह हमारे व्यवहार के लिए उपयोगी नहीं है, क्योंकि यह दृश्य दिन से 3 मिनट 53 सेकंड कम है। दृश्य दिन का मान सदा एक सा नहीं रहता। अत: किसी घड़ी से दृश्य सूर्य के समय का बताया जाना कठिन है। इसके दो कारण हैं: एक तो सूर्य की स्पष्ट गति सदा एक सी नहीं रहती, दूसरे स्पष्ट सूर्य क्रांतिवृत्त में चलता दिखाई देता है। हमें समयसूचक यंत्र बनाने के लिए ऐसे सूर्य की आवश्यकता होती है, जो मध्यम गति से सदा विषुवत्वृत्त में चले। ऐसे सूर्य को ज्योतिषी लोग ज्योतिष-माध्य-सूर्य mean Astronomical Sun अथवा केवल माध्य सूर्य कहते हैं। विषुवत्वृत्त के मध्यम सूर्य तथा क्रांतिवृत्त के मध्यम सूर्य के अंतर को भास्कराचार्य ने उदयांतर तथा क्रांतिवृत्तीय मध्यम सूर्य तथा स्पष्ट सूर्य के अंतर को भुजांतर कहा है। यदि ज्योतिष-माध्य सूर्य में उदयांतर तथा भुजांतर संस्काकर दें, तो वह दृश्य सूर्य हो जाएगा। आधुनिक शब्दावली में उदयांतर तथा भुजांतर के एक साथ संस्कार को समय समीकार Equation of time कहते हैं। यह हमारी घड़ियों के समय माध्य-सूर्य-समय तथा दृश्य सूर्य के समय के अंतर के तुल्य होता है। समय समीकार का प्रति दिन का मात्र गणित द्वारा निकाला जा सकता है। आजकल प्रकाशित होनेवाले नाविक पंचांग nautical almanac में, इसका प्रतिदिन का मान दिया रहता है। इस प्रकार हम अपनी घड़ियों से जब चाहें दृश्य सूर्य का समय ज्ञात कर सकते हैं। इसका ज्योतिष में बहुत उपयोग होता है। विलोमत: हम सूर्य के ऊध्र्व याम्योत्तर बिंदु के लंघन का वेध करके, उसमें समय समीकार को जोड़ या घटाकर, वास्तविक माध्य-सूर्य का समय ज्ञात करके अपनी घड़ियों के समय को ठीक कर सकते हैं।

                                     

1. PERSIA

2500BC.

हमने समय नापने के लिए आधुनिक घड़ियाँ बनाईं, तब यह पाया गया कि सर्दी तथा गर्मी के कारण घड़ियों के धातुनिर्मित पुर्जों के सिकुड़ने तथा फैलने के कारण ये घड़ियाँ ठीक समय नहीं देतीं। अब हमारे सामने यह समस्या थी कि हम अपनी यांत्रिक घड़ियों की सूक्ष्म अशुद्धियों को कैसे जानें? यद्यपि सूर्य के ऊध्र्व याम्योत्तर लंघन की विधि से हम अपनी घड़ियों की अशुद्धि जान सकते थे, तथापि सूर्य के ऊध्र्व याम्योत्तर लंघन का वेध स्वयं कुछ विलष्ट हैं तथा सूर्य के बिंब के विशाल होने के कारण उसमें वेधकर्ता की व्यक्तिगत त्रुटि personal error की अधिक संभावना है। दूसरी कठिनाई यह थी कि हमारी माध्य-सूर्य-घड़ी के समय का आकाशीय पिंडों की स्थिति से कोई प्रत्यक्ष संबंध न था। इसी कमी की पूर्ति के लिए नक्षत्र घड़ी siderial clock का निर्माण किया गया, जो नक्षत्र समय बताती थी। इसके 24 घंटे पृथ्वी की अपने अक्ष की एक परिक्रमा के, अथवा वसंतपात बिंदु के ऊध्र्व याम्योत्तर बिंदु की एक परिक्रमा के, समय के तुल्य होते हैं। 21 मार्च के लगभग, बसंतपात बिंदु हमारे दृश्य-सूर्य के साथ ऊध्र्व याम्योत्तर लंघन करता है। उस समय नाक्षत्र घड़ी का समय शून्य घंटा, शून्य मिनिट, शून्य सेकंड होता है। हमारी घड़ियों में उस समय 12 बजते हैं। दूसरे दिन दोपहर को नाक्षत्र घड़ी का समय 4 मिनट होगा। अन्य किसी भी निचित दिन माध्य-सूर्य के समय को हम अनुपात से नाक्षत्र सम में, या नाक्षत्र समय को माध्य सूर्य के समय में, परिवर्तित कर सकते हैं। नाविक पंचांगों में इस प्रकार के समयपरिवर्तन की सारणियाँ दी रहती हैं। इस प्रकार यदि हमें किसी प्रकार शुद्ध समय देनेवाली नाक्षत्र घड़ी मिल जाए, ते हमें अपनी माध्य घड़ी के समय को शुद्ध रख सकते हैं। यद्यपि नाक्षत्र घड़ी भी यांत्रिक होती है तथा उसमें भी यांत्रिक त्रुटि हो जाती है, तथापि इसे प्रतिदिन शुद्ध किया जा सकता है, क्योंकि इसका आकाशीय पिंडों की स्थिति से प्रत्यक्ष संबंध है। वह इस प्रकार है: कोई ग्रह व तारा ऊध्र्व याम्योत्तर बिंदु से पचिम की ओर खगोलीय ध्रुव पर जो कोण बनाता है, उसे कालकोण कहते हैं। इस प्रकार नक्षत्र सम बसंतपात का कालकोण है। किसी तारा वा ग्रह का विषुवांश बसंतपात से उसकी विषुवत्वृत्तीय दूरी अर्थात् ग्रह या तारे या ध्रुव से जानेवाला बृहत वृत्त जहाँ विषुवत वृत्त को काटे, वहाँ से वसंतपात तक की दूरी होती है। चूँकि कालकोण विषुवद्वृत्त के चाप द्वारा ही जाना जाता है, इसलिए जब ग्रह या तारा ऊर्ध्व याम्योत्तर बिंदु पर होगा, उस समय उसका विषुवांश नाक्षत्र समय के तुल्य होगा।

शब्दकोश

अनुवाद
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