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ⓘ तमिल ईलम के मुक्ति बाघ या संक्षेप में लिट्टे एक तमिल राष्ट्रवादी संगठन है। यह विश्व का एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन हैं जो श्रीलंका के उत्तरी और उत्तर-प ..


तमिल ईलम के मुक्ति बाघ
                                     

ⓘ तमिल ईलम के मुक्ति बाघ

तमिल ईलम के मुक्ति बाघ या संक्षेप में लिट्टे एक तमिल राष्ट्रवादी संगठन है। यह विश्व का एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन हैं जो श्रीलंका के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में दो दशकों से अधिक समय से सक्रिय था। हिन्दी में इसका लघु नाम लिट्टे है। लिट्टे के प्रमुख इसके संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरण हैं जिनको १८ मई २००९ के श्रीलंका सेना ने मार गिराने का दावा किया।

इस संगठन को एक समय दुनिया के सबसे ताकतवर गुरिल्ला लड़ाको में गिना जाता था जिसपर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी 1991, श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे 1993 सहित कई लोगों को मारने का आरोप था। भारत सहित कई देशों में यह एक प्रतिबंधित संगठन है।

                                     

1. स्थापना

इसकी स्थापना १९७५ में वेलुपिल्लई प्रभाकरण द्वारा हुई थी। उस समय कई तमिल युवा श्रीलंका सरकार की नीतियों से क्षुब्ध थे जो देश के तमिलों के प्रति उदासीन सी थी। प्रभाकरन ने ऐसे युवाओं का विश्वास जीत लिया और इस संस्था का गठन किया। उस समय वे छोटे छोटे अधिकारियों पर हमला करते थे, जैसे पुलिसकर्मियों या छोटे नेताओं पर। जाफ़ना के मेयर महापौर अल्फ्रेड डुरैयप्पा की हत्या उस समय उनके द्वारा अंजाम दी जाने वाली पहली बड़ी वारदात थी।

१९८४ में लिट्टे ने एक उग्रवादी मोर्चे की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की जिसके अन्य सदस्य भी तमिळ उग्रवादी समूह थे - तमिळ ईलम लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन अंग्रेज़ी में संक्षेप - टेलो, ईलम रेवॉल्यूशनरी ऑर्गेनाईजेशन ऑफ़ स्टूडेन्ट्स छात्रों का स्वदेशी क्रांतिकारी संगठन, अंग्रेजी में संक्षेप - इरोस, पिपुल लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ तमिल ईलम पी एल ओ टी ई। इस मोर्चे का नाम रखा गया था - ईलम नेशनल लिबरेशन फ्रंट स्वदेश मुक्ति मोर्चा। लेकिन १९८६ में लिट्टे इस मोर्चे से बाहर निकल गया और उसने एक करके अन्य सदस्य संगठनों पर अपना अघिपत्य जमाना चालू कर दिया। सबसे पहले इसने टेलो, जो कि उस समय श्रीलंका का सबसे बड़ा उग्रवादी निगम था, के सदस्यों तथा प्रशिक्षण शिविरों पर सशस्त्र हमला शुरु किया। कुछ महीनों के भीतर ही टेलो के सभी बड़े नेता मारे या पकड़े गए और लिट्टे का प्रभुत्व स्थापित हो गया। इसके बाद इसने इपीआरएलएफ़ के सदस्यों पर हमला बोला जिससे उसे जाफ़ना प्रायद्वीप में अपनी गतिविधियां बंद करनी पड़ी। इसके बाद एलटीटीई ने सभी तमिल लड़ाकों को एलटीटीई में मिल जाने को कहा। उस समय श्रीलंका में छोटे-बड़े २० उग्रवादी संगठन कार्यरत थे, लगभग सभी ने लिट्टे की अधीनता या प्रभुत्व स्वीकाकर लिया। जाफना एक लिट्टे का दबदबा वाला शहर बन गया।

                                     

2. मुक्तिवाहिनी - भारत का हस्तक्षेप

तमिळ लोग, जिनका प्रमुख निवास स्थान दक्षिण भारत का तमिलनाडु राज्य है, इस संघर्ष से परेशान होकर भारत में शरणार्थियों के रूप में आने लगे। स्वदेशी तमिल नस्ल के लोगों ऊपर आए संकट और तमिल शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के बाद 1987 में भारत सरकार ने श्रीलंका की तमिळ समस्या को "सुलझाने" की कोशिश की। भारतीय विमानों ने जाफना में खाने के पैकेट गिराए। इसके बाद भारत और श्रीलंका की सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें तमिल उग्रवादियों को शामिल नहीं किया गया था पर अधिकांश चरमपंथी संगठनों ने इस समझौते का अनुसरण करने का मन बना लिया था। इस समझौते के तहत उत्तरी इपीआरएलएफ़ Ealam Peoples Revolutionary Liberation Front, लिट्टे नहीं के अधिकार वाले तमिळ प्रदेशों में एक हद तक स्वायत्तता दे दी गई और एक समिति का गठन किया गया जिसमें इआरपीएलएफ़ के तमिळ लोग शामिल थे। यह तय किया गया कि भारतीय मुक्तिवाहिनी सेना वहाँ जाएगी और तमिळ लोग हथियार डाल देंगे।

पर इसमें एकमात्र बात ये रह गई कि लिट्टे LTTE को इपीआरएलएफ़ के प्रतिनिधियों की समिति का प्रमुख रास नहीं आया। उसने इसके लिए अपने तीन नुमाइन्दों की पेशकश की जिसे भारतीय सरकार ने ठुकरा दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि अब लड़ाई एलटीटीई और भारतीय सेना के बीच छिड़ गई। भारतीय सरकार ने ये फैसला लिया कि वे लिट्टे को बलपूर्वक लाबंदूक करेंगे। भारतीय सेना ने ऑपरेशन पवन आरंभ किया जिसका यही उद्देश्य था। दो साल तक चल इस संघर्ष में एक समय भारतीय सेना के कोई 50.000 सैनिक श्रीलंका में थे। पर उनको नुकासन उठाना पड़ रहा था और श्रीलंका के मूल सिंहलियों को भी एक विदेशी सेना की उपस्थिति खलने लगी थी। श्रीलंका सरकार के निवेदन पर 1990 में भारतीय सेना श्रीलंका से बेनतीजा कूच कर गई।

                                     

3. संघर्ष

देश के उत्तर में लिट्टे का दबदबा बना रहा। मई 1991 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और 1993 में श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे की हत्या कर दी गई। इसके बाद सालों तक संघर्ष जारी रहा। 1994 में कुछ समय के लिए, जब चन्द्रिका कुमारतुंगे राष्ट्रपति बनीं और उन्होंने शान्ति वार्ता का प्रस्ताव रखा, लड़ाई थमी रही पर लिट्टे द्वारा श्रीलंकाई नौसेना के जहाजों को डुबाने के बाद 1995 में फ़िर से चालू हो गई।

                                     

4.1. प्रमुख आतंकवादी गतिविधियाँ लिट्टे के हमले

  • १९८४ में केंट और डॉलर फॉर्म में आम नागरिकों की सामूहिक हत्या।
  • १९८३ में सैनिक काफिले पर हमला, १३ सैनिकों की मौत।
  • १९८५ में अनुराधापुरम में १४६ नागरिकों की हत्या।
  • १९९९ गोनागाला पर हमला, ५० सिंघलियों मारे गए।
  • १९८९ में जाफना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और मानवाधिकारवादी डॉ रजनी की हत्या।
  • १९७७ में स्वयं प्रभाकरन द्वारा तमिल सांसद एम कनगरत्नम की हत्या।
  • १९७७ में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा की हत्या।
  • १९८७ में एलटीटीई ने पहली बार आत्मघाती हमला किया। विस्फोटकों से भरे ट्रक को सैन्य शिविर की दीवार से टकरा दिया गया। इस हमले में चालीस सैनिक मारे गए। इस हमले के बाद लिट्टे ने १७० से भी अधिक आत्मघाती हमलों को मूर्तरूप दिया। यह संख्या दुनिया के किसी भी संगठन के आत्मघाती हमले की संख्या से अधिक है। आखिरकार आत्मघाती हमला एलटीटीई की पहचाबन गया।
  • २००१ में भंडारनायके अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमला। इस हमले में श्रीलंकाई वायुसेना के आठ और श्रीलंकन एयरलाइन्स के चार विमान नष्ट हो गए।
  • १९९७ में श्रीलंकाई विश्व व्यापार केंद्पर हमला।
  • १९९८ में बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक टेंपल ऑफ टूथ पर हमला।
  • १९९३ में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा की हत्या कर दी।
  • १९९६ में कोलंबों के सेंट्रल बैंक में आत्मघाती हमला, ९० की मौत, १४०० घायल।
                                     

4.2. प्रमुख आतंकवादी गतिविधियाँ हमले का प्रतिरोध

  • १९८३ में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए। इन हमलों में एक हजार से अधिक तमिल मारे गए

तमिलों को सिंहला बहुल क्षेत्रों से भागना पड़ा।

  • १९९१ में भारत के तत्कालीन पंतप्रधान राजीव गांधी की हत्या
  • १९८७ सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन आरंभ किया। इसका लक्ष्य जाफना को मुक्त कराना था। इस ऑपरेशन में सेना को जीत मिली, मगर प्रभाकरन भागने में सफ़ल हो गया।
  • अनुराधापुरम हत्या मामले के प्रतिशोध में सेना ने कुमदिनी बोट पर हत्या कर २३ तमिलों की हत्या कर दी।
                                     

5. अंतिम संग्राम

सन् २००७ में श्रीलंका सेना ने तमिळ बाग़ियों के ख़िलाफ एक सशक्त अभियान शुरु किया। इसमें लिट्टे को छोड़कर आए कुछ बड़े नाम भी श्रीलंका सरकार से मिले हुए थे। पहले उत्तर में और फिर थोड़ा पूरब में सेना को सफलता मिली। मार्च २००९ में सेना धड़ल्ले से आगे बढ़ने लगी और लिट्टे के लड़ाके पीछे। पहले उत्तर की तरफ़ जाफना में सिंहली सेना का अधिकार हो गया। इससे और इससे पहले की सफलताओं से उत्साहित होकर पूरब की तरफ़ सेना का अभियान ज़ोरदार होता गया। सबसे आखिरी गढ़ मुलईतिवु के जंगल और उससे सटे मुलईतिवु का दलदलों से घिरा छोटा सा प्रायद्वीप था जो उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित था। तीन ओर से पानी और एक तरफ़ से मिट्टी की बनाई दीवार के पार से सिंहली सेना द्वारा बुरी तरह घिर जाने से लिट्टे मूक सा हो गया था। १८ मई २००९ को प्रभाकरण के मारने के दावे के साथ ही इसका अस्तित्व खत्म हो गया है।

                                     

6. ध्यातव्य तथ्य

  • इसके कोई एक हफ़्ते खत्म हुए भारतीय आम चुनावों के दौरान तमिळनाडु की द्रमुक तथा अन्नाद्रमुक पार्टी ने एक दूसरे पर श्रीलंकाई तमिळों के लिए कुछ पर्याप्त न करने का आरोप लगाया था। वाइको और करुणानिधि ने ऐसे बयान दिये थे जिससे उनपर देशद्रोह जैसे आरोप लगे थे।
  • जॉर्डन से लौटे श्रीलंकाई राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने सोमवार १७मई, २००९ को यह घोषणा की थी कि वे तबतक घर नहीं जाएंगे जबतक कि तमिळ संघर्ष से देश को मुक्ति नहीं मिल जाती।
  • इससे पहले तमिळनाडु के कोयंबटूर के पास भारतीय सेना के एक वाहन पर भारतीय तमिळों के एक छोटे समूह ने यह कहकर आक्रमण किया कि उनकी वंडी वाहन में श्रीलंका सेना को मदद पहुँचाने के लिए हथियार ले जाया जा रहा है।

शब्दकोश

अनुवाद
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