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ⓘ बुद्ध का स्त्री विमर्श. बुद्ध अपने मार्ग में स्त्री को दीक्षा नहीं देना चाहते थे | बहुत आग्रह पर ही दीक्षा दे पाये | दीक्षा देने से पहले अतिरिक्त आठ नियमों का प ..

                                     

ⓘ बुद्ध का स्त्री विमर्श

बुद्ध अपने मार्ग में स्त्री को दीक्षा नहीं देना चाहते थे | बहुत आग्रह पर ही दीक्षा दे पाये | दीक्षा देने से पहले अतिरिक्त आठ नियमों का प्रावधान किया तब जाकर दीक्षा दी | जिसमें से कुछ इस प्रकार है:-

1. चाहे भिक्षुणी ने सौ वर्ष से उपसम्पदा प्राप्त की हो और चाहे भिक्खु उसी दिन उपसम्पदा प्राप्त किया हो, तो भी भिक्षुणी को ही उसका सत्कार करना होगा, उसे, मानना होगा, पूजना होगा, इस धर्म विनय नियम का जीवन भर अतिक्रमण नहीं करना होगा |

2. भिक्षुणी को किसी भी स्थिति में भिक्षु को गाली नहीं देनी होगी | इस घर्म नियम को जीवन-भर अतिक्रमण न कर इसका सत्कार करना होगा, उसे मानना होगा, पूजना होगा |

बुद्ध ने स्त्री व पुरुष दोनो को भिन्न जाना है | उन्होंने इन दोनों को बाहिय व आन्तरिक तल पर शारीरिक रूप से, व मानसिक रूप से भी भिन्न पाया है | उन्होंने भिन्न तो पाया है, पर ऊंचा नीचा नहीं कहा है | बुद्ध ने इनके भिन्न होने के कारण ही व्यवस्था भी भिन्न की है | बुद्ध का सब मनुष्यों के प्रति समानता का भाव कुछ गहरा है | ऊपर से तो यही लगेगा कि बुद्ध स्त्री के प्रति समानता के पक्षधर नहीं है | पर ऐसा है नहीं |

वस्तुत: बुद्ध का मार्ग ज्ञान मार्गी है, संकल्प मार्गी है, भक्तिमार्गी नहीं है | पुरुष पुरुष चित्त व स्त्री स्त्रैण चित्त के चेतना के केन्द्र भी भिन्न है | पुरुष मूलत: मन Mind केन्द्रित है | उसका सारा जोर बौद्घिक है | वह हर चीज को तर्क वितर्क के आघापर ही तोलता है | तर्क करने में भाव की गुंजाइश नहीं रह पाती | तर्कवान व्यक्ति ही संकल्प आसानी से कर पाता है | इसलिये तर्कवान व्यक्ति कठोर भी होता है | यही व्यक्ति पुरुष-चित बुद्ध के मार्ग के अनुकूल है | पुरुषों में बहुत कम लोग ही स्त्रैण-चित्त वाले मिलेगें | और स्त्रियों में बहुत कम लोग ही पुरुष चित्र वाले मिलेगें | दूसरी तरफ स्त्री स्त्रैण-चित्त की चेतना का तल भावना प्रधान है | प्रेम की मात्रा, भाव की मात्रा स्त्री में प्रगाढ़ होती है | समर्पण उसमें सहज होता है | होश को खोने में, स्वयं के प्रति बेसुध होने में उसे आसानी लगती है | यही स्त्री के आयाम बुद्ध के मार्ग के प्रतिकूल पड़ते हैं | बुद्ध का मार्ग तो होश सम्मा-सति व संकल्प अधिष्ठान का मार्ग है |

इस स्थिति में यदि बुद्ध स्त्रियों को भी ज्यों का त्यों दीक्षा दे देते हैं, तो अधिकतर स्त्रियां लाभ से वंचित ही रह जाती | जब स्त्रियां धम्म के मार्ग पर आरूड़ ही नहीं हो पाती, तब स्त्री की उर्जा का क्या होता? यह एक प्रश्न था, जिसका हल निकालना था | जब स्त्री की उर्जा घम्म के मार्ग पर नहीं बहती, तब उसकी उर्जा संसारिक मार्ग पर ही बहती | क्योंकि स्त्री स्त्रैण-चित्त भाव प्रधान है, तो वह राग का ही ताना-बाना ही बुन पाती | पुरुषों का इस राग में वासना के रूप में गिरना सहज ही था | तो फिर बुद्ध को ऐसी व्यवस्था करनी पड़ी, जिससे पुरुष भी वासना में ना गिरे और स्त्री राग को छोड़कर संकल्प के मार्ग पर चल पड़े |

पुरुष व स्त्री के वासना के तल भी भिन्न भिन्न हैं | पुरुष की वासना का रूप जहां शारीरिक रूप से बहिर्मुखी और क्रियाशील है, वहीं स्त्री की वासना का रूप शारिरिक रूप से गैर क्रियाशील Passive व अंतर्मुखी है | इसलिये बुद्ध ने स्त्री पर भरोसा करना उचित समझा, बजाय पुरुष के | यह बड़ी चकित करने वाली बात है | यह बात भला कैसे समझाई जा सकती है? बुद्ध का मनुष्य के प्रति ग्यान अद्भुत है | इस व्यवस्था विनय के हिसाब से यहां बुद्ध ने स्त्री पर भरोसा कर के पुरष से ज्यादा स्त्री को सम्मान दिया है | बुद्ध ने पुरुष की वासनागत कमजोरी को भी स्वीकाकर लिया है |

अब समझो कैसे? हमारे देश में एक परम्परा है | किसी परिवार में दो भाई हों | बड़ा भाई एक साल ही बड़ा है | बड़े भाई की शादी हो चुकी है | शादी होने के बाद अब छोटे भाई की उसी घर में पत्नी आ गई है | छोटी बहु के आने पर सबसे पहले परिवार वाले क्या करवाते हैं? वे सास ससुर का परिचय करवाते वक्त बहु के जेठ का भी परिचय करवाते हैं | बहु का जेठ उसके पति से केवल एक वर्ष ही बड़ा है, तब भी सास ससुर के पैर छूने के साथ साथ जेठ के भी पैर छुआते हैं | यह बड़ा अजीब व अव्यवहारिक सा लगता है | आखिर इसकी क्या जरूरत है? इस देश के जानकार लोगों ने पुरुष की कमजोरी को अन्दर से भांप लिया है | इस बड़े भाई के मन में कभी भी छोटे भाई की पत्नी के प्रति वासना जाग्रत हो सकती है | इसलिये परिवार में कुछ अनहोनी ना हो जाये, मानसिक व भावनात्मक रूप से जहां तक सम्भव हो सके इसे रोका जाना चाहिये |

पुरुष, पुरुष-चित्त होने के कारण अहंकारी होता है, जिसे वह स्वभिमान कहता है | इस स्वभिमान को बचाने की वह जीतोड़ कोशिश करता है | जब एक स्त्री पुरुष के चरणों में छुक कर उसे देवता का सा दर्जा दे देती है | तब पुरुष में अपना सम्मान स्वभिमान बनाये रखने का संकल्प पैदा हो जाता है | यह स्त्री भी अब पुरुष की नजर में साधारण स्त्री ना रही | यह भी अब इस पुरुष की नजर में ऊपर उठ गई है | पुरुष सामान्यत: उस स्त्री को ही वासना की नजर से देखता है, जो उसकी नजर में हेय हो | हेय होना व वासना में गिरना दोनों एक साथ घटित होते हैं | पुरुष के सबसे पहले वासना में गिरने के आसार अधिक होते हैं | इसलिये बुद्ध ने स्त्री पर ज्यादा भरोसा किया है, और विनय के नियम भी उसी पर ज्यादा बनाये हैं |

अब बुद्ध की स्त्री के प्रति द्रष्टि को समझना आसान हो गया है | इसलिये बुद्ध ने नियम बनाया है, कि भिक्षुणी ज्येष्ठ होने पर भी अपने से जूनियर भिक्षु का पहले अभिवादन करेगी | दूसरा बुद्ध ने यह नियम बनाया है कि भिक्षुणी किसी भी परिस्थिति में भिक्षु को गाली नहीं देगी | बड़ा अजीब सा लगता है | जैसे बुद्ध ने पुरुष भिक्षु को स्त्री भिक्षुणी को गाली व अपमान करने की पूरी छूट ही दे दी हो | जब भिक्षुणी पुरुष भिक्षुु को गाली देगी, तब अधिक सम्भावना यह बनती है कि भिक्षुणी, भिक्षु की निगाहं से गिर जाये और उसे वासना की निगाहं से भी देखने लग जाये | पुरुष वासना में जल्दी गिर सकता है | पुरष बलात्कार भी कर सकता है, इसकी सम्भावना अधिक है | कोई स्त्री तो शायद ही किसी पुरष के साथ बलात्कार की सोचे | हमें विश्लेषण करके ही पता चल पाता है कि बुद्ध ने स्त्री को कितना भरोसा व सम्मान दिया है | बुद्ध की देशना समझना इतना आसान नहीं है | बड़ा धीरज व चित्त की शान्त अवस्था चाहिये निष्कर्ष निकालने से पहले | बगैर ध्यान साधना में उतरे ना तो "घम्म" को समझ सकते हैं, ना ही बुद्घ को |

स्त्री तब तक" चरित्रहीन” नहीं हो सकती, जब तक पुरुष" चरित्रहीन” न हो ~ गौतम बुद्ध!

संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की।

एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली -

आप तो कोई राजकुमार लगते हैं।

क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है?

बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि -

तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया।

बुद्ध ने कहा -

हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह वृद्ध होगा, फिर बीमाऔर अंत में मृत्यु के मुंह में चला जाएगा।

मुझे ‘वृद्धावस्था’, ‘बीमारी’ व ‘मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है।

बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया।

शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई।

गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं।

क्योंकि वह "चरित्रहीन" है!

बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा -

क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है?

मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है।

आप उसके घर न जाएं।

बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा -

मुखिया ने कहा - मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि

मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है।

बुद्ध बोले - इसी प्रकार यह स्त्री स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है?

जब तक इस गांव के पुरुष चरित्रहीन हों!

अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती।

इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं।

यह सुनकर सभी लज्जित हो गए! ये सभी गलत कहानिया बुद्ध को फेमस करने के लिए जोड़ी गयी है । वास्तविकता में बुध्द स्त्रियों को संसार की सभी परेशानियों की जड़ मानते थे ।

                                     
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