पिछला

ⓘ शिक्षाशास्त्र. शिक्षा प्रस्तावना:- शिक्षा एक सजीव गतिशील प्रक्रिया है। इसमें अध्यापक और शिक्षार्थी के मध्य अन्त:क्रिया होती रहती है और सम्पूर्ण अन्त:क्रिया किसी ..


शिक्षाशास्त्र
                                     

ⓘ शिक्षाशास्त्र

शिक्षा

प्रस्तावना:- शिक्षा एक सजीव गतिशील प्रक्रिया है। इसमें अध्यापक और शिक्षार्थी के मध्य अन्त:क्रिया होती रहती है और सम्पूर्ण अन्त:क्रिया किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है। शिक्षक और शिक्षार्थी शिक्षाशास्त्र के आधापर एक दूसरे के व्यक्तित्व से लाभान्वित और प्रभावित होते रहते हैं और यह प्रभाव किसी विशिष्‍ट दिशा की और स्पष्ट रूप से अभिमुख होता है। बदलते समय के साथ सम्पूर्ण शिक्षा-चक्र गतिशील है। उसकी गति किस दिशा में हो रही है? कौन प्रभावित हो रहा है? इस दिशा का लक्ष्य निर्धारण शिक्षाशास्त्र करता है। बाल-केंद्रित शिक्षा

शिक्षा के उद्देश्यों के निर्माण का आधार:- शिक्षा के उदेश्यों का सम्बन्ध सम्पूर्ण समाज के समस्त बालकों से है। अत: इनके निर्माण का कार्य अत्यन्त उतरदायित्वपूर्ण है। यदि जल्दी से अनुचित प्रथा दोषपूर्ण उदेश्यों का निर्माण करके शिक्षा की प्रक्रिया की संचालित कर दिया गया तो केवल एक अथवा दो बालक को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज की आने वाली न जाने कितनी पीढ़ियों को हानि होने का भय है। अत: इस सम्बन्ध में समाज के बालकों तथा शिक्षा के शिधान्तों को दृष्टि में रखते हुए यथेष्ट विचार विनिमय तथा गूढ़ चिन्तन की आवश्यकता है जिससे शिक्षा के वैज्ञानिक तथा लाभप्रद उद्श्यों का निर्माण किया जा सके। वस्तुस्थिति यह है कि शिक्षा समाज का दर्पण है। समाज की उन्नति अथवा अवनित शिक्षा पर ही निर्भर करती है। जिस समाज में जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होती है, वह समाज वैसा ही बन जाता है। चूँकि शिक्षा के उदेश्यों का जीवन के उदेश्यों से सम्बन्ध होता है, इसीलिए शिक्षा के उदेश्यों का निर्माण करना भी ठीक ऐसे ही है जैसे जीवन के उदेश्यों को निर्धारित करना। इस सम्बन्ध में यह खेद का विषय है कि शिक्षा के उदेश्यों का निर्माण अब तक उन लोगों ने किया है जिनका शिक्षा से कोई सम्बन्ध ही न रहा है। दुसरे शब्दों में, शिक्षा के उदेश्यों का निर्माण अब तक केवल माता-पिता, दार्शनिकों, शासकों, राजनीतिज्ञों तक विचारकों ने ही किया है, शिक्षकों ने नहीं। इन शभी उदेश्यों की प्रकृति में अन्तर है। इनमें से कुछ उद्देश्य तो सनातन, निश्चित तथा अपरिवर्तनशील है और कुछ लचीले, अनुकूलन योग्य एवं परिवर्तनशील। पाठकों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि शिक्षा के उदेश्यों की प्रकृति में अन्तर क्यों है? इसका उत्तर केवल यह है कि शिक्षा के मुख्य आधार चार हैं। वे हैं – 1 आदर्शवाद 2प्रकृतिवाद, 3 प्रयोजनवाद तथा 4 यथार्थवाद। इन्ही चारों आधारों के अनुसार शिक्षा में उक्त सभी प्रकार के उदेश्यों की रचना हुई हैं, हो रही है तथा होती रहेगी। जब तक हम शिक्षा के विभिन्न आधारों का अध्ययन नहीं करेंगे तब तक हमको शिक्षा के उदेश्यों के विषय में पूरी जानकारी नहीं हो सकेगी।

                                     

1. शिक्षण के सिद्धान्त

प्रत्येक अध्यापक की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो। इसके लिये अध्यापक को कई बातों को जानकर उन्हे व्यवहार में लाना पड़ता है, यथा - पाठ्यवस्तु का आरम्भ कहां से किया जाय, किस प्रकार किया जाय, छात्र इसमें रुचि कैसे लेते रहें, अर्जित ज्ञान को बालकों के लिये उपयोगी कैसे बनाया जाय, आदि। शिक्षाशात्रियों ने अध्यापकों के लिये इन आवश्यक बातों पर विचार करके अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-

१ क्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्त

बालक स्वभावतः ही क्रियाशील होते हैं। निष्क्रिय बैठे रहना उनकी प्रकृति के विपरीत है। उन्हे अपने हाथ, पैर व अन्य इन्द्रियों को प्रयोग में लाने में अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होती है। स्वयं करने की क्रिया द्वारा बालक सीखता है। इस प्रकार से प्राप्त किया हुआ ज्ञान अथवा अनुभव उसके व्यक्तित्व का स्थाई अंग बन कर रह जाता है। अतः अध्यापक का अध्यापन इस प्रकार होना चाहिए जिससे बालक को स्वयं करने द्वार सीखने के अधिकाधिक अवसर मिलें।

२ जीवन से सम्बद्धता का सिद्धान्त

अपने जीवन से सम्बन्धित वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करना बालकों की स्वाभाविक रुचि होती है। अतः पाठ्यवस्तु में जीवन से सम्बन्धित तथ्यों को ही शामिल करना चाहिये अर्थात् वास्तविक जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से लिये गये तथ्यों को ही शामिल करना चाहिये। यदि अध्यापक काल्पनिक अथवा जीवन से असम्बन्धित तथ्यों को ही पढ़ाना चाहेगा तो छात्रों की रुचि उससे हट जायेगी।

३ हेतु प्रयोजन का सिद्धान्त

जब तक बालकों को पाठ का हेतु अथवा उद्देश्य पूर्णतया ज्ञात नहीं होता है, वे उसमे, पूर्ण ध्यान नहीं दे सकते। केवल पाठ का उद्देश्य जान लेने से भी काम नहीं चलता। यदि पाठ का उद्देश्य बालकों की रुचि को प्रेरणा देने वाला हुआ तो उनका पूरा ध्यान उस पाठ को सीखने में लगता है।

४ चुनाव का सिद्धान्त

मनुष्य का जीवनकाल अत्यन्त कम है और् ज्ञान का विस्तार असीम है। अतः पाठ्य सामग्री में संसार की अपार ज्ञानराशि में से अत्यन्त उपयोगी वस्तुओं को चुनकर रखा जाना चाहिये।

५ विभाजन का सिद्धान्त

सम्पूर्ण पाठ्यवस्तु बालक के सम्मुख एकसाथ नहीं प्रस्तुत की जा सकती। उसे उचित खण्डों, अन्वितियों अथवा इकाइयों में विभक्त किया जाना चाहिये। अन्वितियां ऐसी हों जैसी कि सीढ़ियां होती हैं। इन्हें जैसे-जैसे बाल पार करता जाये, वह उन्नति करता जाये।

६ पुनरावृत्ति का सिद्धान्त

बालक किसी पाठ्यवस्तु अथवा ज्ञान को अपने मस्तिष्क में ठोस प्रकार से तभी जमा कर सकता है जब बार-बार उसकी आवृत्ति करायी जाय।

                                     

2. शिक्षण-सूत्र

१ ज्ञात से अज्ञात की ओर चलो

बालक के पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करते हुए यदि नया ज्ञान प्रदान किया जाता है तो बालक को उसे सीखने में रुचि व प्रेरणा प्राप्त होती है। मनुष्य सामान्यतया इसी क्रम से सीखता है। इसलिये अध्यापक को अपनी पाठ्य सामग्री इस क्रम में प्रस्तुत करना चाहिये।

२ सरल से कठिन की ओर चलो

पाठ्यवस्तु को इस प्रकार प्रस्त्तुत करना चाहिये कि उसके सरल भागों का ज्ञान पहले करवाया जाय तथा धीरे-धीरे कठिन भागों को प्रस्तुत किया जाय।

४ स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलो

सूक्ष्म तथा अमूर्त विचारों को सिखाते समय उनका प्रारम्भ आसपास की स्थूल वस्तुओं तथा स्थूल विचारों से करना चाहिये। बालक की शिक्षा सदैव स्थूल वस्तुओं तथा तथ्यों से होनी चाहिये; शब्दों, परिभाषाओं तथा नियमों से नहीं।

५ विशेष से सामान्य की ओर चलो

किसी सिद्धान्त की विशेष बातों को पहले रखे, फिर उनका सामान्यीकरण करना चाहिये। गणित, विज्ञान, व्याकरण्, छन्द व अलंकारशास्त्र की शिक्षा देते समय इसी क्रम को अपनाना चाहिये। आगमन प्रणाली में भी इसी का उपयोग होता है।

६ अनुभव से तर्क की ओर चलो

ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बालक यह तो जान लेता है कि अमुक वस्तु कैसी है किन्तु वह यह नहीं जानता कि वह ऐसी क्यों है। बार-बार निरीक्षण व परीक्षण से वह इन कारणों को भी जान जाता है। अर्थात् वह अनुभव से तर्क की ओर बढ़ता है। बालक के अनुभूत तथ्यों को आधार बनाकर धीरे-धीरे निरीक्षण व परीक्षण द्वारा उनकी तर्कशक्ति का विकास करने का प्रयत्न करना चाहिये।

७ पूर्ण से अंश की ओर चलो

बालक के सम्मुख उसकी समझ में आने योग्यपूर्ण वस्तु या तथ्य को रखना चाहिये। इसके बाद उसके विभिन्न अंशों के विस्तृत ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिये। यदि एक पेड़ का ज्ञान प्रदान करना है तो पहले उसका सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत किया जायेगा तथा बाद में उसकी जड़ों, पत्तियों, फलों आदि का परिचय अलग करवाया जायेगा।

८ अनिश्चित से निश्चित की ओर चलो

इस सूत्र के अंतर्गत अस्पष्ट एवं अनियमित ज्ञान को स्पष्ट एवं नियमित करना होता है। छात्र अपनी संवेदनाओ द्वारा अनेक अष्पष्ट एवं अनियमित वस्तुओं की जानकारी करता है, परंतु शिक्षक को चाहिए कि वह उसे स्पष्ट करे।

९ विश्लेषण से संश्लेषण की ओर चलो

यह सूत्र पूर्ण से अंश की ओर सूत्र का विपरीत है, इसके अंतर्गत छात्र को पूर्व ज्ञान प्रदान किया जाय तत्पश्चात इस पूर्ण का विभिन्न अंशो में विश्लेषण किया जाय और इसके उपरांत फिर उसे पूर्णता की और संश्लेषित किया जाय। १० तर्क पूर्ण विधि का त्याग व मनोवैज्ञानिक विधि का अनुसरण करो

वर्तमान समय में मनोविज्ञान के प्रचार के कारण इस बात पर जोर दिया जाता है कि शिक्षण विधि व क्रम में बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, रुचियों, जिज्ञासा और ग्रहण शक्ति को ध्यान में रखा जाय।

११ इन्द्रियों के प्रशिक्षण द्वारा शिक्षा दो

१२ प्रकृति का आधार

बालक को शिक्षा इस प्रकार मिलनी चाहिये कि वह उसके प्राकृतिक विकास में बाधा न बने बल्कि सहायक हो।

शब्दकोश

अनुवाद
Free and no ads
no need to download or install

Pino - logical board game which is based on tactics and strategy. In general this is a remix of chess, checkers and corners. The game develops imagination, concentration, teaches how to solve tasks, plan their own actions and of course to think logically. It does not matter how much pieces you have, the main thing is how they are placement!

online intellectual game →