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ⓘ अवधिज्ञान. जैनसंमत आत्ममात्र सापेक्ष प्रत्यक्ष ज्ञान का एक प्रकार अवधिज्ञान है। परमाणपर्यंरूपी पदार्थ इस ज्ञान का विषय है। इसका विपर्यय विभंगज्ञान है। इसकी लब्ध ..

                                     

ⓘ अवधिज्ञान

जैनसंमत आत्ममात्र सापेक्ष प्रत्यक्ष ज्ञान का एक प्रकार अवधिज्ञान है। परमाणपर्यंरूपी पदार्थ इस ज्ञान का विषय है। इसका विपर्यय विभंगज्ञान है। इसकी लब्धि जन्म से ही नारकों और देवों को होती है। अतएव उनका अवधिज्ञान भवप्रत्यय और शेष पंचेंद्रियतिर्यच और मनुष्यों का क्षायोपशयिक अथवा गुण प्रत्यय है, अर्थात् तपस्या आदि गुणों के निमित्त से उन्हें प्राप्त होनेवाली यह एक ऋद्धि है। गणगार को उनके गुणों के अनुसार प्राप्त होनेवाले अवधिज्ञान के ये छह भेद हैं-आनुगामिक, अनानुगामिक, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित।

                                     
  • मत ज ञ न स ज न गए पद र थ क व षय म व श ष ज नन क श र तज ञ न कहत ह अवध ज ञ न - द रव य क ष त र कल भ व क मर य द ल ए ह ए र प द रव य क स पष ट प रत यक ष
  • ज न ह पहल ब र द ख कर ल ग च त त ह न लग थ क लकर प रत श र त न अपन अवध ज ञ न स इसक क रण समझ ल ग क समझ य क र शन प रद न करन व ल व क ष क
  • पर क ष व षय क ज ञ न म समर थ ह इस अल क क ज ञ न क त न र प ह - अवध ज ञ न मन: पर य य और क वलज ञ न प र ण ज ञ न क क वलज ञ न कहत ह यह न र व ण
  • कर ग द व व म न स वर ग स अवत र ण ह ग न ग न द र क भवन ब लक अवध ज ञ न ह ग चमकत ह ई रत नर श ब लक रत नत रय - सम यक दर शन, सम यक ज ञ न
  • अत न द र य ज ञ न क प र प त ह ई ह अत न द य ज ञ न क त न प रक र ह - अवध ज ञ न मन पर यवज ञ न और क वलज ञ न इन सबक प र प त क ल ए समत क स धन एक

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