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ⓘ देवी श्री महालक्ष्मी धाम ऊन. साँचा:देवी श्री महालक्ष्मी मन्दिर ऊन से जुडी खास बातेदेवी श्री महालक्ष्मी मन्दिर से जुड़े रोचक तथ्य दिनेश दसोंधी ऊन द्वारा सम्पादित ..


                                     

ⓘ देवी श्री महालक्ष्मी धाम ऊन

साँचा:देवी श्री महालक्ष्मी मन्दिर ऊन से जुडी खास बातेदेवी श्री महालक्ष्मी मन्दिर से जुड़े रोचक तथ्य दिनेश दसोंधी ऊन द्वारा सम्पादित:- ऐतहासिक मन्दिरों की नगरी ऊन के साथ कई पौराणिक व धार्मिक आस्था के केंद्र जुड़े होने से इसे निमाड़ की काशी के नाम से भी जाना जाता हे खजुराहो में स्थित पुरातन शेली के निर्मित कलाकृतियों के समान प्रदेश के दूसरे नंबर का यह पुरातत्वीय स्थल अपने अंदर कई धार्मिक अवधारणाओं को समेटे हुए हे जिला मुख्यालय से 18 कि. मी. दुरी पर यहा एक टीले पर पूर्व मुखी देवी श्री महालक्ष्मी का द्वापरकालिन मंदिर विद्दमान हे जहा माता पिंडी रूप में विराजित है तथा प्रात:कालीन की सूर्य की किरणे माता महालक्ष्मी जी के चरणों को स्पर्श करती हुई अपने अगले आयामों पर पहुचती है 12 शताब्दी में निर्मित इस गुफा मंदिर में शारदीय नवरात्री पर्व पर विशेष हवन पुजन में दर्शनार्थीयो का ताता लगता हे सभी मनोकामनाओ को पूर्ण करने वाली यहा स्थित देवी की प्रतिमा को अति चमत्कारी माना जाता हे ऐसी अवमानना हे की देवी प्रतिमा के दिन में तिन रूपों में दर्शन होते हे प्रात:काल बाल्य अवस्था दोपहर में युवा अवस्था, तथा सांध्यकालीन बेला में माता के प्रौढ़ अवस्था में दर्शन होते हे इस मंदिर के इतिहास के बारे मे झाका जाए तो वर्षो पूर्व यह एक निर्जन स्थान था तथा चोर डकैतो के आलावा जंगली जानवरो के भय से यहा कोई भी नही आता जाता था जंगल के बिच इसी स्थान पर माता यहा गुफा के अंदर पिण्डी रूप में विराजित हुआ करती थी थी सन 1930 के दशको में ग्राम के ग्वालो की इस मंदिपर प्रथम दृष्ठि पड़ी तथा बाद में सप्ताह में एक बार लोग समूह में पहुच कर यहा आरती की करने लगे यहा पदस्थ सूबेदार भगवानदिन यादव ग्रामीणों के साथ सप्ताह में एक बार मंगलवार माता की पुजा व अर्चना करने पहुचते थे 1940 के दशको में सूबेदार यादव ने मंदिर के जिर्नोदार का प्रथम बीड़ा उठाया था इस बात को लेकर भी एक रोचक कहानी जुडी हुई है जिसे हम निचे बतायेंगे उस समय का निर्जन आज जिले के साथ प्रदेश भर के श्रद्धालुओं के आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका हे और आज यह स्थान बाम्बे के बाद दुसरे स्थान पर प्राचीन महालक्ष्मी मन्दिर के रूप में गिना जाता है | यहा प्रतिदिन सेकड़ो श्रद्धालु माता दर्शन के लिए पहुचते हे वही नवरात्र से दीपावली तक लाखो भक्त देवी दर्शन करने पहुचते है तो प्रतिवर्ष दीपावली पर होने वाले भंडारे में एक लाख से ज्यादा श्रदालु प्रसादी ग्रहण करते हे |

मन्दिर के प्रथम जीर्णोद्धार से जुडी कहानी - बताया जाता हगे की जिन दिनों जंगल में माता मन्दिर के होने की बात पता चली तब इस स्थान पर चोर डकैतों का बड़ा आतंक हुआ करता था इसी बात को लेकर पुलिस कप्तान ने यहा के सूबेदार भगवानदीन को आठ दिनों में चोरो को पकड़ने का अल्टीमेटम जारी किया था और ऐसा नही होने पर उनकी तथा पुरे स्टाफ की मजदूरी अर्थात सेलरी रोकने की बात कहि थी तब सूबेदार भगवान् दिन ने माता की मन्नत ली की वे यदि चोरो को पकड़ने का उन्हें आशीर्वाद प्रदान कर उनकी मदद करेंगी तो यहा वे मन्दिर निर्माण करायेंगे इसके बाद माता आशीर्वाद से भगवानदीन चोरो को पकड़ने में सफल हुए जिससे वे माता के अनन्य भक्त बन गए देवी श्री धाम के प्रथम जीर्णोद्धार का श्रेय भी माता के इसी भक्त को जाता है

देवी श्री धाम के साथ कई धार्मिक अवधारणाए जुडी हुई हे कहा जाता हे कि माता महालक्ष्मी की इच्छा के विरुद्ध शिशुपाल माता से विवाह करने बारात लेकर पहुचा था क्रोधवश माता ने शिशुपाल का वध किया,शिशुपाल की प्रतिमा के टूटे अवशेष आज भी इस अवधारणाओं को प्रमाणित करने के लिए मंदिर परिसर में विद्धमान हे साथ ही ग्राम को विष्णु पत्नी महालक्ष्मी का विवाह स्थल माना जाता हे। यहा स्थित नारायनकुंड पर बने मण्डप तथा बारात में लाए हाथी के पेरो के निशान आज भी इस विवाह साक्ष्य के रूप मे हे माता महालक्ष्मी के प्रिय आसन कमल के फुलो की दुर्लभ प्रजाति के 32 पंखुड़ीयो के कमल की तलाई भी यहा आस्था का केंद्र हे इन तीनो त्रिवेणी संगम ने मातो श्री धाम को पुरे भारत वर्ष में एक अनुठा स्थान प्रदान किया हे महालक्ष्मी मन्दिपर आज दीपावली की बड़ी अमावस्या अर्थात महालक्ष्मी पूजन पर दूर दराज के भक्त माता दर्शन के लिए पहुचते है इस अवसर पर माता का प्रिय आसन कहे जाने वाले यहा के प्रसिद्ध बत्तीस पंखुडियो के कमल फुल भी अर्पित किये जाते है अवधारणाओ के अनुसार इस मन्दिर से अनेक तरह के इतिहास जुड़े हुए है जिनमे से एक यहा खिलने वाली बत्तीस पंखुडियो वाली कमल तलाई भी सामिल है माना जाता है कीदेवी माता के चमत्कार से हर वर्ष यहा दीपावली के पूर्व से ही कमल के फुल खिलने लगते है यहा भारत वर्ष के इक्का दुक्का स्थानो में खिलने वाला दुर्लभ प्रजाति का गुलाबी लाल व सफेद बत्तीस पंखुडियो वाला कमल फुल खिलता हे जो समूचे प्रदेश में अव्वल स्थान रखता हे गाँव से दूर जंगल स्थित इस पावन स्थान को देवी का ससुराल अर्थात वेकुंठ धाम भी कहा जाता

माता का भण्डारा: - देवी धाम पर प्रति वर्ष दीपावली के बाद गोपाष्टमी की तिथि को माता के अन्न-कूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है इस दिन माता के विशेष श्रंगार के साथ पुरे देश भर से आये भक्तो का यहा ताता लगता है गोपाष्टमी के दिन ऐसा लगता है मानो माता का हर भक्त यहा आस्था व विश्वास का नया इतिहास रचने आता है चारो तरफ भक्तो का हुजूम,माता के जयकारे,दर्शनों की लम्बी कतारे सब मानो कोई आस्था का सैलाब इस दिन यहा उमड़ा हो,प्रति वर्ष देश प्रदेश के साथ समीपवर्ती महाराष्ट सहित गुजरात के देवी भक्त यहा इस एतिहासिक भंडारे में सम्मलित होने आते है

शब्दकोश

अनुवाद
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