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ⓘ लोधा परमार. परमार का शाब्दिक अर्थ शत्रु को मारने वाला होता है। प्रारम्भ में परमारों का शासन आबू के आस-पास के क्षेत्रों तक ही सीमित था। प्रतिहारों की शक्ति के ह् ..

लोधा परमार
                                     

ⓘ लोधा परमार

परमार का शाब्दिक अर्थ शत्रु को मारने वाला होता है। प्रारम्भ में परमारों का शासन आबू के आस-पास के क्षेत्रों तक ही सीमित था। प्रतिहारों की शक्ति के ह्रास के उपरान्त परमारों की राजनीतिक शक्ति में वृद्धि हुई। इतिहासकरों के मुताबिक परमार चंद्रवंशी क्षत्रिय थे जो बाद में अग्निवंशी बने थे। बोद्धकाल में बौद्ध धर्म की प्रगति व प्रसाऔर वैदिक धर्म के पतन के कारणों से चिन्तित आर्य ऋषियों ने बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये समस्त क्षत्रिय राजाओं को आमंत्रित कर आबू पर्वत पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें अनेक राजाओं को यज्ञाग्नि के समक्ष दीक्षित कर उन्हें राजपूत नाम दिया। तभी से अग्निवंशी क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई। तभी से यज्ञ में सम्मिलित कुछ चन्द्रवंश के क्षत्रियों को अग्निवंश में गिना जाने लगा था जिनमे परमार वंश भी था लेकिन परमार वंश के आज भी कई साखाये ऐसी हे जो आज भी अपने मूल वंश यानि चन्द्रवंश में ही है लेकिन अब उन्होंने खुद को परमार वंश से पृथक कर लिया है और वो खुद को चंद्रवंशी क्षत्रिय कहलाना ही पसंद करते है.

                                     

1. आबू के परमार

आबू के परमार वंश का संस्थापक धूमराज था, लेकिन इनकी वंशावली उत्पलराज से प्रारम्भ होती है। पड़ौसी होने के कारण आबू के परमारों का गुजरात के शासकों से सतत् संघर्ष चलता रहा। गुजरात के शासक मूलराज सोलंकी से पराजित होने के कारण आबू के शासक धरणीवराह को राष्ट्रकूट धवल का शरणागत होना पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद धरणीवराह ने आबू पर पुनः अधिकाकर लिया। उसके बाद महिपाल का 1002 ई. में आबू पर अधिकार प्रमाणित होता है। इस समय तक परमारों ने गुजरात के सोलंकियों की अधीनता स्वीकाकर ली। महिपाल के पुत्र धंधुक ने सोलंकियों की अधीनता से मुक्त होने का प्रयास किया। फलतः आबू पर सोलंकी शासक भीमदेव ने आक्रमण किया। धंधुक आबू छोड़कर धार के शासक भोज के पास चला गया। भीमदेव ने विमलशाह को आबू का प्रशासक नियुक्त किया। विमलशाह ने भीमदेव धंधुक के मध्य पुनः मेल करवा दिया। उसने 1031 ई. में आबू में आदिनाथ के भव्य मंदिर का भी निर्माण करवाया। धंधुक की विधवा पुत्री ने बसन्तगढ़ में सूर्यमंदिर का निर्माण करवाया व सरस्वती बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया। कृष्णदेव के शासनकाल में 1060 ई. में परमारों और सोलंकियों के सम्बन्ध पुनः बिगड़ गए, लेकिन नाड़ौल के चौहान शासक बालाप्रसाद ने इनमें पुनः मित्रता करवाई। कृष्णदेव के पौत्र विक्रमदेव ने महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण की। विक्रमदेव का प्रपौत्र धारावर्ष 1163-1219 ई. आबू के परमारों का शक्तिशाली शासक था। इसने मोहम्मद गौरी के विरूद्ध युद्ध में गुजरात की सेना का सेनापतित्व किया। वह गुजरात के चार सोलंकी शासकों कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज व भीमदेव द्वितीय का समकालीन था। उसने सोलंकियों की अधीनता का जुआ उतार फेंका। उसने नाडौल के चौहानों से भी अच्छे सम्बन्ध रखे। अचलेश्वर के मन्दाकिनी कुण्ड पर बनी हुई धारावर्ष की मूर्ति और आर-पार छिद्रित तीन भैंसे उसके पराक्रम की कहानी कहते हैं। कीर्ति कौमूदी नामक ग्रंथ का रचयिता सोमेश्वर धारावर्ष का कवि था। उसके पुत्र सोमसिंह के शासनकाल में तेजपाल ने आबू के देलवाड़ा गाँव में लूणवसही नामक नेमिनाथ का मंदिर अपने पुत्र लूणवसही व पत्नी अनुपमादेवी के श्रेयार्थ बनवाया। इसके पश्चात् प्रतापसिंह और विक्रम सिंह आबू के शासक बने। 1311 ई. के लगभग नाडौल के चौहान शासक राव लूम्बा ने परमारों की राजधानी चन्द्रावती पर अधिकाकर लिया और वहाँ चौहान प्रभुत्व की स्थापना कर दी।

                                     

2. जगनेर के बिजौलिया के परमार

मालवा पर मुस्लिम अधिकार के बाद परमारों चारों ओर फैल गये। इनकी ही एक शाखा जगनेर आगरा के पास चली गई। उनके ही वंशज अशोक मेवाड़ आये। जिनको महाराणा सांगा ने बिजौलिया की जागीर दी। जगदीशपुऔर डुमराँव का पंवार वंश- भोज के एक वंशज मालवा पर मुस्लिम अधिकार के बाद परिवार सहित गयाजी पिण्डदान को गये। वापस आते समय इन्होंने शाहाबाद जिला बिहार के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया। बादशाह शाहजहाँ ने इनके वंशज नारायण मल्ल को भोजपुर जिला जागीर में दे दिया। इन्होंने जगदीशपुर को अपनी राजधानी बनाया। बाद में इन्होंने आरा जिला में डुमराँव को अपना केन्द्र बनाया। इसी वंश में 1857 की क्रांति के नायक वीर कुंवरसिंह का जन्म हुआ, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये थे।

                                     

3. देवास और धार के परमार

मालवा पर मुस्लिम अधिकार के समय परमारों की एक शाखा जो जगनेर आगरा के पास चली गई जहाँ से मेवाड़ गये अशोक के छोटे भाई शम्भूसिंह ने पूना और अहमदनगर के पास के इलाकों पर कब्जा कर लिया किन्तु पड़ौसी शासक ने उसे धोखे से मार दिया। इन्हीं के वंशजों ने शिवाजी के पुत्र राजाराम को मराठा साम्राज्य के विस्तार व सुरक्षा में उल्लेखनीय योगदान दिया, जिससे प्रसन्न हो छत्रपति राजाराम ने इन्हें विश्वासराव सेना सप्त सहस्त्रों की उच्च उपाधियाँ प्रदान की। इन्हीं के वंशज देवास व धार के स्वामी बने।
                                     

4. उमट परमार

इस वंश के राजगढ़ व नरसिंहगढ़ पहले एक ही संयुक्त राज्य थे। यही कारण है आजतक इन दोनों राज्यों के भाग एक दूसरे में अवस्थित है। यहाँ के शासक परमार वंश के आदि पुरुष राजा परमार के मुंगराव के वंशज है।

                                     

5. संखाला पंवार परमार

सांखला परमारों की एक शाखा है। वि.सं. 1318 के शिलालेख में शब्द शंखकुल का प्रयोग किया गया है। किराडू के परमार शासक बाहड़ का पुत्र बाघ जयचंद पड़िहार के हाथों मारा गया। बाघ के पुत्र वैरसी ने ओसियां की सचियाय माता से वर प्राप्त कर पिता की मौत का बदला लिया। नैणसी लिखते है कि माता ने उसे दर्शन दिए और शंख प्रदान किया, तभी से वैरसी के वंशज सांखला कहलाने लगे। इसने जयचंद पड़िहार के मून्धियाड़ के किले को तुड़वा कर रुण में किला बनवाया तब से ये राणा कहलाने लगे।
                                     

6. सोढा परमार

किराडू के शासक बाहड़ के पुत्र सोढा से परमारों की सोढा शाखा चली। सोढाजी सिंध में सूमरों के पास गये जिन्होंने सोढाजी को ऊमरकोट पाकिस्तान से 14 कोस दूर राताकोर दिया। सोढा के सातवें वंशधर धारवरीस के दो पुत्र आसराव और दुर्जनशाल थे। आसराव ने जोधपुर में पारकर पर अधिकार किया। दुर्जनशाल ऊमरकोट की तरफ गया। उसकी चौथी पीढ़ी के हमीर को जाम तमायची ने ऊमरकोट दिया। अंग्रेजों के समय राणा रतनसिंह सोढा ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया पर उन्हें पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया गया।

                                     

7. वराह परमार

ये मारवाड़ के प्रसिद्ध परमार शासक धरणी वराह के वंशज थे जिनका राज्य पूरे मारवाड़ और उससे भी बाहर तक फैला हुआ था। उसके नौकोट किले थे। इसीलिए मारवाड़ नौ कुटी कहलाई। मारवाड़ के बाहर उसका राज्य संभार प्रदेश, जैसलमेर तथा बीकानेर के बहुत से भूभाग पर था। वर्तमान जैसलमेर प्रदेश पर उनके वंशज यानि वराह परमारों की दो उप-साखायें चुन्ना परमारों व लोधा परमारों के राज्य थे। लोधा परमारों की रियासत लोद्रवा थी जिसके अंतिम शासक थे महाराज नृपभानु सिंह। आज लोधा परमारो को लोधा लोधी-लोध राजपूत नाम से जानते हे। देवराज भाटी ने पंजाब से आकर विक्रम सम्वत 700 के करीब लोद्रवा रियासत ओर उसके अधीन आने वाला भू-भाग लोधा लोधी-लोध राजपूतों से छीन कर अपने अधीन कर लिया था।

                                     
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