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ⓘ बृज भाषा एक धार्मिक भाषा है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में बोली जाती है। इसके अलावा यह भाषा हरियाणा एवं राजस्थान के कुछ जनपदों में भी बोली जाती है। ..


                                     

ⓘ बृज भाषा

बृज भाषा एक धार्मिक भाषा है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में बोली जाती है। इसके अलावा यह भाषा हरियाणा एवं राजस्थान के कुछ जनपदों में भी बोली जाती है। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ये भी संस्कृत से जन्मी है। इस भाषा में प्रचुर मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। भारतीय भक्ति काल में यह भाषा प्रमुख रही।

                                     

1. भौगोलिक विस्तार

अपने विशुद्ध रूप में बृज भाषा आज भी भरतपुर,आगरा, धौलपुर, हिण्डौन सिटी, मथुरा, मैनपुरी, एटा और अलीगढ़ जिलों में बोली जाती है। इसे हम "केंद्रीय बृजभाषा" के नाम से भी पुकार सकते हैं। केंद्रीय बृजभाषा क्षेत्र के उत्तर पश्चिम की ओर बुलंदशहर जिले की उत्तरी पट्टी से इसमें खड़ी बोली की लटक आने लगती है। उत्तरी-पूर्वी जिलों अर्थात् बदायूँ और एटा जिलों में इसपर कन्नौजी का प्रभाव प्रारंभ हो जाता है। डॉ॰ धीरेंद्र वर्मा, "कन्नौजी" को बृज भाषा का ही एक रूप मानते हैं। दक्षिण की ओर ग्वालियर में पहुँचकर इसमें बुंदेली की झलक आने लगती है। पश्चिम की ओर गुड़गाँव तथा भरतपुर का क्षेत्र राजस्थानी से प्रभावित है।

बृज भाषा आज के समय में प्राथमिक तौपर एक ग्रामीण भाषा है, जो कि मथुरा-भरतपुर केन्द्रित ब्रज क्षेत्र में बोली जाती है। यह मध्य दोआब के इन जिलों की प्रधान भाषा है:

  • भरतपुर
  • एटा
  • गौतम बुद्ध नगर
  • मथुरा
  • फ़िरोज़ाबाद
  • कासगंज
  • आगरा
  • हाथरस
  • बुलंदशहर
  • अलीगढ़
  • मैनपुरी

गंगा के पार इसका प्रचार बदायूँ, बरेली होते हुए नैनीताल की तराई, उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले तक चला गया है। उत्तर प्रदेश के अलावा इस भाषा का प्रचार राजस्थान के इन जिलों में भी है:

  • हिण्डौन सिटी
  • भरतपुर
  • धौलपुर

और करौली जिले के कुछ भाग हिण्डौन सिटी| जिसके पश्चिम से यह राजस्थानी की उप-भाषाओं में जाकर मिल जाती है।

                                     

2. विकास यात्रा

इसका विकास मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उससे लगते राजस्थान व मध्य प्रदेश में हुआ। मथुरा, भरतपुर, हिण्डौन सिटी, धौलपुर, आगरा, ग्वालियर आदि इलाकों में आज भी यह मुख्य संवाद की भाषा है। इस एक पूरे इलाके में बृजभाषा या तो मूल रूप में या हल्के से परिवर्तन के साथ विद्यमान है। इसीलिये इस इलाके के एक बड़े भाग को बृजांचल या बृजभूमि भी कहा जाता है।

भारतीय आर्यभाषाओं की परंपरा में विकसित होनेवाली "बृज भाषा" शौरसेनी अपभ्रंश की कोख से जन्मी है। जब से गोकुल वल्लभ संप्रदाय का केंद्र बना, बृज भाषा में कृष्ण विषयक साहित्य लिखा जाने लगा। इसी के प्रभाव से बृज की बोली साहित्यिक भाषा बन गई। भक्तिकाल के प्रसिद्ध महाकवि महात्मा सूरदास से लेकर आधुनिक काल के विख्यात कवि श्री वियोगी हरि तक बृज भाषा में प्रबंध काव्य तथा मुक्तक काव्य समय पर रचे जाते रहे।

                                     
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शब्दकोश

अनुवाद
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