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ⓘ फ़िल्म गीता से गुम होता साहित्य सुनीता काम्बोज. लोकगीत, और कविता भारत की मिटटी में बसें हैं यह कहा जाता है, कि सृष्टि की उत्पत्ति ओम की संगीतमय ध्वनि से हुई, मा ..


                                     

ⓘ फ़िल्म गीता से गुम होता साहित्य सुनीता काम्बोज

लोकगीत, और कविता भारत की मिटटी में बसें हैं यह कहा जाता है, कि सृष्टि की उत्पत्ति ओम की संगीतमय ध्वनि से हुई, मानव और संगीत का सम्बन्ध बहुत पुराना है । प्राचीन साहित्यकार सूरदास, तुलसीदास,कबीरदास,तानसेन, बैजूबावरा, चन्द्रबरदाई आदि सुप्रसिद्ध कवियों का अनुपम काव्य संगीतमय होने के कारण आज भी जिन्दा है । जब भारतीय सिनेमा का उदय हुआ, तब फिल्मों में साहित्यकारों की कविताओं और उपन्यासों को फिल्माया जाने लगा । सिनेमा साहित्य के मजबूत कंधों पर खड़ा हुआ । साहित्य के बिना सिनेमा जगत की कल्पना नहीं की जा सकती । सिनेमा पुरातन कथाओं एवं लोकगीतों के साथ कदम मिला कर चला और लोगों के दिलों की धड़कन बना । भारतीय सिनेमा की नीव दादासाहब फालके ने सन 1913 में रखी । सन 1913 से सन 1929 तक मूक फिल्मों की प्रधानता रही । 1931 में पहली सवाक फिल्म आलमआरा बनी । आलमआरा के साथ भारतीय सिनेमा में गीतों का जो कारवाँ चला वो कभी नहीं थमा । कहा जाता है कि आलमआरा में संवाद कम व गीत अधिक थे । इसमें कहानी को गीतों द्वारा ही आगे बढाया गया था । भारतीय सिनेमा की शुरुआत बाचचीत के माध्यम से नहीं अपितु गीतों के माध्यम से हुई । पहला गीत.दे दे खुदा के नाम पर प्यारे….इस गीत को अभिनेता वजीर मोहम्मद खान ने गाया । इस गीत का रचनाकार बेनाम है यानि कही भी उनके नाम का उल्लेख नहीं मिलता । यह भारतीय सिनेमा की बड़ी विडम्बना है कि निर्देशक, नायक, नायिका संगीतकार व गायक के मुकाबले गीतकार को हमेशा शोहरत और पारिश्रमिक दोनों ही कम मिले हैं । यह फिल्म बहुत लोकप्रिय रही, इसके बाद भारतीय सिनेमा ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । सिनेमा की चमकती दुनिया ने सबको आकर्षित किया । प्रसिद्ध साहित्यकारों ने सिनेमा की दुनिया में प्रवेश किया । फ़िल्मी गीतों के द्वारा आम आदमी की बात कहने वाले गीत लोगों को अपने जीवन से जुड़े प्रतीत हुए । और मिटटी से रचे बसे फ़िल्मीं गीतों ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया।

यह सौभाग्य की बात है कि हिंदी सिनेमा को बहुत से समर्थ कवियों और साहित्यकारों का आशीष प्राप्त हुआ। भरत व्यास, कवि प्रदीप, गुलजार, मजरुह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी, प्रेमधवन, शैलेन्द्र, कैफ़ी आजमी, साहिर लुधियानवी, जावेद अख्तर, आनंद बख्शी, निदा फाजली, हसन कमाल, हसरत जयपुरी, गुलशन बाँवरा, बलराज सहानी, गोपालदास नीरज आदि कवियों द्वारा लिखे गए गीतों ने हिंदी सिनेमा को नई पहचान दी । कुछ साहित्यकारों ने निर्देशन और नायक की भूमिका में भी सफलता प्राप्त की । बहुत कम लोग जानते हैं कि जिन बलराज सहानी को सफल अभिनेता के रूप में जाना जाता है वह एक विख्यात लेखक भी रहे । साहित्यकारों के गीतों की सादगी और उत्तम शिल्प के कारण यह गीत लोगों के दिलों पर राज करने लगे । तीसरी कसम, आप आए बहार आई, प्रेम रोग आदि अनेकों फ़िल्मों ने अपने गीतों के कारण ही ख्याति पाई । हिंदी साहित्यकारों के गीतों ने सांस्कृतिक रंग, दार्शनिकता, व्यवहारिकता, शिक्षा और मनोरंजन के कारण ही इन गीतों ने भारत में ही नहीं अपितु विश्व में अपनी पहचान बनाई । आरम्भिक दौर में पहले से लिखे गीतों, लोकगीतों, कविताओं को फिल्म में रखा गया परन्तु साहित्कारों का संघर्ष तब और बढ़ गया जब गीतकार को फिल्म के दृश्य के मुताबिक एवं पहले से तैयार धुन पर गीत लिखने को कहा गया । कुछ रचनकारों ने इसे स्वीकार किया व कुछ ने फिल्म दुनिया को अलविदा कह दिया क्योंकि साहित्य शिल्प से खिलवाड़ करना और समझौता उन्हें गवारा नहीं था । पुराने दौर में फिल्मों का उद्देश्य मात्र धन अर्जित करना नहीं था बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, आध्यत्मिक, सामजिक, नारी जीवन और मजदूर व किसान वर्ग के हर पहलू को छू कर मानव ह्रदय तल तक पहुँचना था ।साहित्यकाऔर फिल्मों का सम्बन्ध जब से छूटने लगा तब से फ़िल्मी गीतों में कुरूपता नजर आने लगी धीरे -धीरे फिल्मों का व्यापारीकरण होने लगा और प्रतियोगिता की होड़ के कारण फ़िल्मी गीतों से साहित्य पिछड़ने लगा । फ़िल्मी गीत लिखने वाले अधिकतर साहित्यकार मंचों पर बहुत लोकप्रिय रहे । शुद्ध साहित्यकार कला पक्ष को दरकिनार करके लिखना कभी नहीं स्वीकारता । इसलिए गीतों का सौन्दर्य धूमिल होता गया

साहित्यकार हमेशा सामयिक विषयों का चयन करके अपनी कृति में रंग भरता है । कवि एवं लेखक सदा समाज में फैले आडम्बरों, सामाजिक समस्याओं व जमीनी मुद्दों को अपनी आवाज बनाते आए हैं । आरम्भ में फ़िल्मकारों ने भी मानव की नब्ज़ टटोलते हुए, महँगाई, जमीन अधिकरण, नारी मन, बेरोजगारी, राजनीति मुद्दों पर अनेक फ़िल्में बनाई । लोगों ने सिनेमा को सर माथे बिठाया । इन फ़िल्मों ने समाज को जागृत किया और इस दौर में देशभक्ति गीत, आध्यत्मिक गीत, लोरी गीत,बालगीत एवं त्योहारों की खुशबू से रचे बसे गीतों को रचा गया ।

डॉ० अलमा इकबाल की इस कविता" सारे जहाँ से अच्छा” को फ़िल्मों में गीत के रूप में गाया गया । इसे भाई- बहन और धरम पुत्र फिल्मों में गाया गया । स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान आन्दोलनकारियों में उर्जा का संचार करने के लिए साहित्यकारों ने अनेक इंकलाबी गीतों की रचना करके इस युग में अहम भूमिका अदा की । बंकिम चन्द्र द्वारा लिखित वन्दे मातरम ओजस्वी रचना को फ़िल्म आंनद मठ में,राजेन्द्र किशन की कविता" जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया. श्यामलाल गुप्त पाषर्द जी द्वारा रची कविता" झंडा उचा रहे हमारा.गिरिजाकुमार माथुर द्वारा रचित गीत" हम होगे कामयाब एक दिन.और शायर राम प्रसाद बिस्मिल ने सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. हरिवंशराय बच्चन की कविता अग्निपथ आदि अनेक कविताओं को गीतों के रूप में गाया गया । रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा 1911 -12 में लिखी रचना को जन-गण-मन और राम सिंह ठाकुर द्वारा लिखित गीत" कदम-कदम बढाए जा. को आजाद हिन्द फौज ने कौमी तराने के रूप में अपनाया । प्रेम धवन की कविता" ऐ मेरे प्यारे वतन” फिल्म काबुलीवाला में फ़िल्माया । आजादी के बाद 1957 में फ़िल्म नया दौर, मदर इण्डिया, उपकार, सन 1949 में दो बीघा जमीन, जैसी फिल्मों ने सामाजिक दायित्व निभाते हुए युवा वर्ग में नई शक्ति भरने में कामयाबी प्राप्त की ।

भ रत व्यास का योगदान गीतकार के रूप में अविस्मरणीय है। साहित्यकार के रूप में उन्होंने अनेक विधाओं में लेखन किया। आरम्भिक पहचान उनकी नाटककार के रूप में मिलती है । वह स्वयं रंगमंच पर अभिनय में दक्ष थे । उन्होंने" दुहाई” फिल्म के लिए पहला गीत लिखा इनसे बाद फिल्म –नवरंग आधा है चन्द्रमा रात आधी. फ़िल्म- ‘जनम-जनम के फेरे’ जरा सामने तो आओ छलिए. फ़िल्म-रानी रूपमतिआ लौट के आजा मेरे मीत तुझे., फ़िल्म-संत ज्ञानेश्वरजोत से जोत जलाते चलो.,बेदर्द जमाना क्या जाने, परिणिता, मन की जीत, तूफान और दिया आदि फिल्मों के लिए यादगार गीत लिखे । उन्होंने हिंदी फिल्मों के अलावा राजस्थानी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे । उनके गीतों की ताजगी आज भी पहले जैसी है । भरत व्यास जी ने करीब सवा सौ फिल्मों में गीत दिए । उनके गीत मानवीय संवेदना, भक्ति, विरह वेदना, संयोग वियोग की अनुभूति से भरे हैं ।उनके अधिकतर गीत लता जी व मुकेश जी ने गाए । नवरंग, सारंगा, गूंज उठी शहनाई, बेदर्दी जमाना क्या जाने, प्यास की प्यास आदि फिल्मों को अपने गीतों से सजाया ।

कवि प्रदीप ने सन 1940 में फ़िल्म- बंधन के लिए पहला गीत लिखा फ़िल्म-जागृति आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ., हम लाएँ हैं तूफ़ान से कस्ती निकाल के. 1943 में फिल्म-किस्म्म्त का गीत-दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है.लिखा । इस गीत से नाराज होकर ब्रिटिश शासन ने उनके गिरफ्तारी के आदेश दे दिए । सन 1975 में फ़िल्म-जय संतोषी माँ यहाँ-वहाँ-जहाँ- तहाँ मत पूछो कहाँ-कहाँ., इस गीत को प्रदीप जी ने अपनी आवाज भी दी । उनके गीत आज भी लोगों के अधरों पर सजे हैं । प्रदीप ने सन 1962 में भारत चीन युद्ध में शहीद हुए वीरों को समर्पित उनका गीत" ऐ मेरे वतन के लोगो”., लता मंगेशकर ने दिल्ली के रामलीला मैदान से नेहरु जी की उपस्थिति में गाया जिसे सुन कर नेहरु जी की आँखों में आँसू आ गए व समस्त देशवाशियों के दिलों की धड़कन बना । निराला जी, कवि प्रदीप से बहुत प्रभावित थे उन्होंने झूला,नास्तिक, मशाल, पैगाम, तलाक़, वामन अवतार आदि लगभग 80 फिल्मों के लिए 1700 के करीब गीत लिखे सन 1997 में प्रदीप को 45 वाँ दादा फालके पुरस्कार मिला ।

सन 1948 तक कवि शैलेन्द्र की पहचान कवि व मजदूर नेता के रूप में थी । शैलेन्द्र की कविताएँ और गीत हजारों लोगो की आवाज बने । उनकी एक कविता" जलता है पंजाब” सुनकर राजकपूर बहुत प्रभावित हुए और उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखने का निवेदन किया । आरम्भ में शैलेन्द्र ने मना कर दिया परन्तु बाद में उन्होंने फ़िल्म बरसात और पतली कमर के लिए दो गीत लिखे जो सुपरहिट रहे ।

शैलेन्द्र ने भोजपुरी फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे फ़िल्म तीसरी कसमदुनिया बनाने वाले.,सजन रे झूट मत बोलो.,नानी तेरी मोरनी को मोर ले गे., फ़िल्म –श्री 420 रमैया वस्तावैया-रमैया वस्तावैया., मेरा जूता है जापनी.,फ़िल्म-अनाड़ी सब कुछ सीखा हमने., फ़िल्म –तीसरी कसम सजन रे झूठ मत बोलो., फ़िल्म-गाईड गाता रहे मेरा दिल.,आज फिर जीने की तमन्ना है. आदि गीत आज भी मन को तृप्त करते हैं ।

गोपालदास नीरज ने 1953 में प्रथम श्रेणी में एम. ए. करने के बाद हिंदी प्रवक्ता के पद पर कार्य किया । कवि सम्मेलनों की अपार सफलता के कारण उन्हें फ़िल्म" नई उम्र की नई फसल” में पहला गीत लिखने का निमन्त्रण प्राप्त हुआ । पहली फिल्म के लिए उनके लिखे गीत. कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे.,प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा. की लोकप्रियता के बाद उन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों के लिए गीत लिखकर अनमोल सुरीले गीत दुनिया को उपहार स्वरूप भेट किए ।

फ़िल्म-चंदा और बिजली काल का पहिया घूमें रे भैया.,फ़िल्म-मेरा नाम जोकर ए भाई! जरा देख के चलो.,फ़िल्म-पहचान बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ., फ़िल्म-शर्मीलीओ- मरी-ओ मेरी शर्मीली.,फ़िल्म-कन्यादान लिखे जो खत तुझे.एवं मेरा नाम जोकर, प्रेमपुजारी, शर्मीली, आदि फ़िल्मों के लिए. 1959 -60 में नीरज को सर्वश्रेष्ट गीतकार फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला । सन 1991 में उन्हें पद्म श्री व 2007 में पद्म भूषण से नवाजा गया । सन 1973 में गोपालदास जी ने मुम्बई छोड़ दी । गोपालदास जी के गीत आज भी आनंद और खुशबू बिखेरते हैं ।

1958 में आनन्द बख्शी को पहला अवसर प्राप्त हुआ भगवान दादा की फ़िल्म भला आदमी के लिए जिसके लिए उन्होंने चार गीत लिखे । ‘हिमालय की गोद, जब-जब फूल खिले फ़िल्मों ने उन्हें नया मुकाम दिलवाया । काला समन्दर, महेंदी लगी तेरे हाथ, आदमी मुसफ़िर है, कुछ तो लोग कहेंगे, दम मारो दम, कटी पतंग, शोले, अमर अकबर एंथनी, कर्मा, खलनायक, ताल, गदर आदि प्रसिद्ध फ़िल्मों के लिए भी उन्होंने गीत लिखे । उन्होंने 550 से ज्यादा फिल्मों के लिए लगभग चार हजार गीत लिखे और 40 बार उनका नाम फिल्मफेयर के लिए नामित किया गया । कई गायकों का पहला गीत आनन्द बख्शी जी ने लिखा। खिलौना जानकर तुम क्यों. फिल्म-खिलौना में इस कविता को गीत के रूप में रखा गया, फ़िल्म-अमर प्रेम बड़ा नटखट है रे.,फ़िल्म -मिलन सावन का महीना पवन करे शौर., फ़िल्म –चाँदनीलगी आज सावन की फिर वो झड़ी है.,फ़िल्म-अंधा कानून रोते- रोते हँसना सीखो.आदि यादगार गीत आज भी वही महक समेटे हुए हैं ।

साठ के दशक में फ़िल्मी गीतों में उर्दू का प्रभाव अधिक रहा क्योंकि इस दौर में उर्दू शायरों ने सिनेमा जगत में अहम भूमिका अदा की निदा फाजली 1964 में मुम्बई आए और धर्मयुग और बिलिट मैगजीन पत्रिकाओं के लिए लिखा उनकी शायरी की खूबी से लोग बहुत प्रभावित थे । उन्होंने रजिया सुल्तान1983 में अपना पहला गीत दिया । निदा फाजली एक स्थापित साहित्यकार थे । उनके अनेक काव्य संग्रह प्रकशित हुए आत्मकथा, संस्मरण, दोहे अनेक विधाओ से सजी उनकी लेखनी ने गजब के गीत लिखे" तेरा हिज्र मेरा नसीब है”.,तेरा गम मेरी हयात है फ़िल्म सरफरोश के लिए.,उनका पहला गाना था । होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है., फ़िल्म-अहिस्ता अहिस्तातू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है.,फिल्म -इस रात की सुबह चुप तुम रहो चुप हम रहे. आदि फिल्मों को अपने गीतों से सजाया ।

शकील बदायूँनी उर्दू के साहित्यकाऔर शायर थे 1946 में मुम्बई आकर और संगीतकार नौशाद के कहने पर ; हम दिल का अफसाना दुनिया को सूना देंगे.गीत लिखा जो नौशाद को बहुत पसंद आया इसके बाद उन्होंने फ़िल्म -" दर्द” के लिए अफसाना लिख रही हूँ., फ़िल्म-चौदहवी का चाँदचौदहवी का चाँद हो या आफ़ताब हो., फ़िल्म-सन आफ इण्डियानन्हा मुन्ना रही हूँ. आदि खूबसूरत और सदाबहार फ़िल्मी गीत सिनेमा जगत को दिए ।उन्होंने करीब 90 फिल्मों के लिए गीत लिखे

सन 1959 में गुलशन बाँवरा ने पहली फिल्म" चंद्रसेना” के लिए पहला गीत लिखा । वह प्रसिद्ध कवि और गीतकार थे जिन्होंने करीब 250 गीत लिखे । उन्होंने फ़िल्म-उपकारमेरे देश की धरती सोना उगले., फ़िल्म -हाथ की सफाईतू क्या जाने बेवफा.,फ़िल्म-जंजीर दीवाने हैं दीवाने को ना घर चाहिए.,फ़िल्म-कसमें-वादेआती रहेंगी बहारे जाती रहेंगी.,आदि मनभावन गीत सिनेमा को दिए । उपकार के गीत मेरे देश की धरती., के लिए उन्हें 1967 फ़िल्मफेयर से नवाजा गया सत्ते पे सत्ता,अगर तुम न होते,झूठा कही का, आदि फ़िल्मों के लिए शानदार गीत लिखे । लालबहादुर शास्त्री उनके इन गीतों के बड़े प्रसंशक थे।

यह वह दौर था । जब गीतों में सावन की घटाएँ उमड़ती थी और मदभरे नैना का जादू चलता था । अब गीतों में प्रवेश करती अश्लीलता और फहूड़ता समाज के लिए घातक परिणाम लेकर आएगी धीरे धीरे सिनेमा का रूप बदला और उद्देश्यहीन फिल्मों और गीतों का ज्यादा चलन बढ़ा । 21वीं सदी में भी कुछ अच्छी फ़िल्में और गीतों की रचना हुई । निर्देशक ने गीतकारों को अपने ढंग से शब्दों का प्रयोग करने का दबाव बनाना शुरू किया तब से साहित्य भी फ़िल्मी गीतों से बिछुड़ने लगा । अब गीतों से वो सरसता और संवेदना लुप्त होती जा रही हैं ।

जबकि पुराने तरानों को जब दोबारा नई धुनों के साथ गाया गया तो इन गीतों की मिठास युवा वर्ग के सर चढ़ कर बोली । गुलाबी आँखे जो तेरी देखी.,धीरे धीरे से मेरी जिन्दगी में आना., दिलबर मेरे कब तक मुझे., आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल., कुछ न कहों.,पल दिल के पास तुम.,ये रात भीगी भीगी., इत्यादि पुराने गीतों को जब दोबारा गाया तो इनके भाव पक्ष और कला पक्ष की दृढ़ता के कारण आज भी बहुत लोकप्रिय हुए और इन सदाबाहर गीतों ने अपनी रंगत सदा बनाए रखी है ।

21 वीं सदी में फिल्मीं गीतों की रंगत फीकी पड़ती जा रही है । आए दिन बहुत से फ़िल्मी गीत विवादों में फँसे रहते हैं । कुछ गीतों को छोड़ कर अधिकतर गीत दो पल सुनकर वहीं छूट जाते हैं, आज गीत अपनी हदें लाँघ रहे हैं । गीतों का गिरता स्तर अहसास करवाता है, कि आज गीतों से साहित्य गुम होता जा रहा हैं ।

शब्दकोश

अनुवाद
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